ताबो में शाम को ठंड ने बाहें खोल ली थी। ड्राइवर भैया का एक परिचित होम स्टे था। तो 800₹ में दो कमरे मिल गए। ठिठुरन भरी रात का अंत हुआ। प्रातः पहाड़ों की एक ओर चहचहाती सुबह ने दस्तक दी। सभी जल्द तैयार हुए और ताबो मोनेस्ट्री देखने निकल पड़े।

आध्यात्मिकता इसके परिसर के प्रवेशद्वार से ही अपनी उपस्थिति की अनुभूति करवाती है। शांत हवा में धीमी ध्वनि में मन्त्रों के जाप घुल रहे हैं। सकारात्मक ऊर्जा हल्के हल्के आपके अंदर समाहित हो रही है।चारों ओर से सेबों के पेड़ों से घिरा हुआ परिसर और शांत वातावरण आपको ऊर्जावान व सुगन्धित कर देता है।

बचपने से ग्रसित हम सभी जन मठ में अंदर भी अपनी बातों में लगे हुए थे पर यहां तो किसी को फर्क ही नहीं पड़ता। वहाँ बैठे छात्र और गुरुजन सभी ध्यान मग्न थे। मठ के अंदर कुछ देर बैठने के बाद मन शान्त हो गया। सब घूमने के बाद हम बाहर नाश्ते के लिए बैठे थे कि ड्राइवर भैया एक वीडियो दिखाते हुए बोले:

कल सड़क चौड़ीकरण के समय माइंस के प्रयोग के कारण सारा पहाड़ टूट गया है और सड़क भी इसके साथ नदी बह गई हैं। शाम तक अगर रास्ता नहीं बना तो ऊपर गांव वाले कच्चे रास्ते से जाना पड़ेगा।

स्पिति नदी के किनारे किनारे हम अब नाको की ओर वाले रास्ते मे निकल गए। नजारा तो खूबसूरत था ही,पर इस बार रास्ता करवट बदला हुआ सा लग रहा था। थोड़ी देर देखने के बाद गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी और सीधे विश्राम खाब संगम( कहब संगम भी कहते हैं) में किया। सड़क की जानकारी प्राप्त की गई पता चला कि मार्ग दुरुस्त होने में दो दिन का समय लगेगा। अब एक रास्ता था और वो था गांव का कच्चा साहसिक रास्ता।

अब रास्ता ऊपर की ओर ( गांव का नाम भूल गया हूँ ) पहाड़ की चोटी की ओर बढ़ चला अभी तक सारा रास्ता बढ़िया था पर ड्राइवर भैया के चेहरे की हवाइयाँ उड़ी हुई थी। चोटी से एक कच्चा ढलान मार्ग रिकांगपिओ की ओर जाता है। दूसरे वाहन को पास देने तक की जगह नहीं थी। गड्डों से भरा उबड़ खाबड़ रास्ता जिसके किनारे से खाई में नीचे पक्की सड़क दिखती। इस बार अभिनव के साथ अंकित के भी हाल ढ़ीले हो गए। माही और मैं नीचे झांक झांक कर ऊंचाई से यह जोशीला दृश्य देख रहे थे। मोड़ पर गाड़ी देखते अगर कोई गाड़ी दिखती तो पास के लिए मोड़ पर ही रुक जाते। जैसे तैसे रिकांगपिओ पहुँचे । इस रास्ते में गाड़ी के भी मोच आ गई और उसका सॉकर टूट गया जो रिकांगपिओ में दूसरा डाला गया।

गाड़ी सही करके हमें रामपुर तक पहुंचा दिया। और अब न चाहते हुए भी विदा लेने का वक्त आ पहुंचा। इन शुष्क पहाड़ों की शुष्क हवा ने मन को अपनी यादों से नरम कर दिया। विषम स्थिति में भी दूसरों की सहायता कर अपने सर को उठाकर जीना यही पहचान है यहाँ की। यह नम्रतापूर्ण व्यवहार जो स्पिति घाटी के जन की पहचान है जो आपको दूसरी दुनिया का एहसास करवाती है। और सिखाती है कि परिस्थितियां कितनी ही कठिन क्यों न हो जाएं अपनी नम्रता का त्याग कभी न करें। सभी से कठिनाई में भी मधुर व सह्रदय से मिलें। यह जगह हमको जीना सिखाती है। जीवन मे 1 बार जरूर जाएं– #स्पिति_घाटी

इति।

Image may contain: mountain, sky, outdoor and nature

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *