आज अंकित ने हमारी ताकत की परीक्षा का इंतजाम कर लिया था। वो ठान चुका था कि आज पिंजर गाँव से किब्बर की ओर पैदल ही जाया जाएगा और यदि बीच में गाड़ी मिल गयी तो उसमें बैठ लेंगें। पर पता नहीं क्यों हमें मन ही मन लगा कि हमारी गाड़ी नहीं आएगी। काफी विचारविमर्श और पूर्ण बहुमत के बावजूद भी हमारी बात अमान्य हो गयी। इस बार अंकित की जिद्द हम पर भारी पड़ गयी।

पिंजर से किब्बर की ओर पैदल चल पड़े। अंकित बर्फ में लेट लेट कर चित्रखीचक प्रक्रिया के मजे ले रहा था। पर हमारी चित्रखीचन में कोई रुचि नहीं थी। ढलान की ओर सड़क कई बार सर्प की तरह घूमी हुई थी। क्षण भर में मैंने नीचे की ओर सीधे चलने का फैसला कर लिया। जो कि सही भी रहा। हम सीधे गधेरे से पानी की धारा के साथ चलते चलते किब्बर गांव से 2 किमी पहले सड़क पर निकल आये थे। शुद्ध पानी की धारा को पीकर थोड़ी सी बची ताकत फिर से जुटा कर आगे बढ़ चले।

पीछे पलटने पर पता चला कि पंत जी महाराज अभी इस ढलान से जद्दोजहद में है कि जल्दी कैसे उतरा जाय। अब पन्त जी की हालत से पता लगने लगा था कि इनकी ताकत ने भी जवाब दे दिया है। हमने उन्हें किसी बाइक सवार से लिफ्ट माँगने को कहा तो उन्होंने उसे सिरे से नकार दिया।

आगे 1 किमी के बाद तिराहे में ( काजा से आता रास्ता 1 ओर किब्बर की ओर, तो दूसरी ओर पिंजर गांव की ओर ) निकल रहा था। बहुत से yo yo gang(थार गैंग व बुलट गैंग ) वाले रास्ता रोके चित्रखीचन कार्यक्रम में व्यस्त थे। लिफ्ट माँगने पर उन्होंने हम पर ऊपर से नीचे तक एक नजर मारी और कोई गाँव देहाती समझ कर हमारी अर्जी खारिज कर दी। खैर तभी याद आया कि असली भारत तो गांव में बसता है तो बिना बुरा माने हम आगे बढ़ गए।

अंकित हल्के हल्के बहुत पीछे छूट गया अब वो लड़खड़ाते हुए आता दिखाई दे रहा था। फिर से ढलान में माही और मैं कूद पड़े सीधे सीधे अंकित और हम में कुछ किमी का अंतर हो गया। अंकित सूक्ष्म रूप में आते हुए दिख रहा था। ढलान में पैर रोकना असम्भव सा हो गया। गैंग वाले वाहन कभी हम से आगे तो कभी हम उनसे आगे हो जाते। ऊपर नजर मारी तो अंकित सड़क में बैठ चुका था। हाथ हिलाने में आवाज आई कि : मैं नहीं आ रहा हूँ तुम लोग जाओ और गाड़ी लेकर आओ, यहीं मिलूंगा।

अपनी हालत भी अब बत से बत्तर हो चुकी थी जैसे तैसे आगे बढ़ते। आतेे गाड़ी से की मोनेस्ट्री की दूरी पूछ लेते। और जाती हुई गाड़ी से लिफ्ट माँगने की नाकाम कोशिश करते। एक स्थानीय व्यक्ति अपनी गाड़ी सही कर रहा था। पूछने में पता चला कि की मोनेस्ट्री 2 किमी रह गयी है। आगे बढ़े ही थे कि उन सज्जन ने पीछे से आकर अपनी गाड़ी में लिफ्ट दे दी। वो मोनेस्ट्री में चल रहे कार्यक्रम में गए घर वालों को वापस लेने जा रहे थे। क्षण भर में पहुंच गए मोनेस्ट्री।

अभिनव व ड्राइवर भैया मोनेस्ट्री में दावत उड़ा के मौज में थे। यहाँ तो भगवान ने उन सज्जन का रूप धारण करके हमारी जान बचा ली थी। अपनी गाड़ी में पहुँचे तो दोनों की गाथा सुनी यहाँ अलग ही ख्याली प्लाव पक रहे थे। हमने सोचा कि तुम ये इशारा करोगे या वो करोगे। फिर हमने सोचा तुम खुद नीचे आ जाओगे। गुस्सा तो बहुत था पर अब शरीर की ताकत समाप्ति की ओर थी। अतः अपनी ताकत झगड़ने में व्यर्थ नहीं करने में भलाई समझी गयी। गाड़ी किब्बर गांव की ओर चल पड़ी।

रास्ते में खड़े अंकित भाई का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसकी व ड्राइवर भैया की तीखी नोकझोंक वाली बातें हुईं। फिर मैंने दोनों को बीच में पड़कर माहौल शांत किया। भूख से बुरे हाल थे और अब गाड़ी को रेस्टोरेंट की ओर ले जाने की बात होने लगी। काजा की राह में अब शाम के नजारे अपने जलवे बिखेरे हमें समोहित करके बार बार वापस की मोनेस्ट्री की याद दिलों दिमाग में परिपक्व कर रही थी। पेट पूजा के बाद हम निकल पड़े ताबो की ओर। कल ताबो मोनेस्ट्री घूमने के बाद वापसी होगी। पर क्या वापसी इतनी आसानी से हो जाएगी।

जारी है…

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