असमंजस की स्थिति को छोड़ आगे शांति की राह में बढ़ चले और शांति की प्रतिमा ( बौद्ध प्रतिमा ) के पास आ पहुँचे। कुछ देर विचारविमर्श हुआ और निष्कर्ष पर पहुँचे कि

: “अभि” वापस गाड़ी की ओर जाएगा। और हमें ऊपर वाले गाँव में मिलेगा। और हम तीनों ऊपर की ओर चढ़ाई करेंगें।

अंकित ( अभि को समझाते हुए) : तू हमें देखना। अगर हाथ हिला रहे होंगें तो तू कार लेकर ऊपर आ जाना। और अगर हाथ नहीं हिलाया तो यहीं रुकना हम यहीं वापस आयेंगें।
मैं: पन्तजी यहाँ से ऊपर हाथ दिखना मुश्किल है । हम सीटी बजायेंगे। तो आना नहीं तो रुके रहना।
अभि: तुम लोग ऊपर से हाथ भी हिलाना और सीटी भी बजाना। मैं कार लेकर ऊपर आ जाऊँगा।

सबकी सहमति के बाद हम व अभि एक दूसरे की विपरीत दिशा में गतिशील हो गए। ऊपर की ओर से नजारा अविश्वसनीय था ज्यों ज्यों चढ़ाई बढ़ती जाती त्यों त्यों साँस का फूलना बढ़ता जाता। पर एक ही नजारे को अलग अलग ऊँचाई से देखने पर अद्भुत आनन्द आ रहा था। कुछ दूरी चढ़ते फिर सोचते कि उस ऊँचाई से कैसा नजारा दिख रहा होगा।

आधी से अधिक ऊँचाई को चढ़ने के बाद हमारे बीच थोड़ी दूरी बन गई। माही पहले की तरह बेफिक्र सबसे आगे निकल गया उसने चित्रखीचक यन्त्र का पूरा उपयोग कर डाला हर एक कदम और एक चित्र। हर यात्रा की तरह दूसरे स्थान पर कायम मैं पन्त जी की चिंता करते हुए उसके लिए रुक जाता। और अंतिम स्थान पर काबिज अंकित पन्त साँसों के साथ गुथमगुथा करते हुए एक स्थान पर खड़े थे। एक पैर आगे,दायीं तरफ से कमर को हाथ से सहारा दिए हुए सांस खीचतें हुए अंकित भाई।

मैं: पन्तजी नीचे को वापस चले जाओ हम लोग चोटी से चित्र ( फोटो) लेकर वापस आते हैं।
अंकित: अरे तुम लोग चलो चित्र लो। तब तक मैं हल्के हल्के ऊपर पहुँच जाऊंगा। फिर अभि को हाथ हिलाकर ऊपर ही बुला लेंगें।

अंततः शिखर की इस कठोर परीक्षा में हम सभी उत्तीण हो गए। वाकई इस शुष्क पहाड़ में चढ़ते समय ऑक्सीजन की कमी का एहसास होता है। ये दिखने में जितना कठोर है इस पर चढ़ना उससे भी ज्यादा कठिन है। ग्रामीणजन को मेरा नमन जो रोज कई चक्कर इसी रास्ते से आवाजाही करते हैं।

ऊपर पहुंचते ही आपको दूर दूर के नजारे देखने को मिलते हैं हर तरफ चोटियाँ बर्फ से आच्छादित हैं। नीचे “की मठ” के नजारे इस दृश्य को यादगार बना देते हैं। आप सारी थकान भूलकर प्रकृति की गोद में खो जाना चाहते हो। हर पवन के झोंके को आप अपने मन में आजीवन के लिए कैद करना चाहते हो।

भूख प्यास से पेट में चूहे दौड़कर बेहोश होने को थे। पानी की प्यास तो एक बार फिर बर्फ खाकर ही पूरी कर ली गयी। तभी माही ने एक सेब दिखाकर हम दोनों का दिल जीत लिया। तीनों में सेब का बंटवारा हुआ। तीनों को लगा कि आज तो डूबते को तिनके का सहारा मिल गया।

ऊपर चोटी में तेज हवा के बीच गुम्बद खड़ा है और मन्त्रों से भरी हुई छोटी छोटी पतंगें हवा के वेग में उड़ रही हैं। अब आयी बारी फिर से नीचे की ओर देखकर हाथ हिलाकर संदेश देने की। पर क्या सच में यहाँ से “अभि” हमें देख पाएगा। नीचे देखने में 3 एक जैसी कार खड़ी दिख रही थी पर बिंदु समान मनुष्य का अब आभास भी नहीं हो रहा था। क्योंकि बाहर सिर्फ बच्चे से ही दिखाई दे रहे थे।

पन्त जी : अरे मैने उसे नीचे से ही हाथ हिला दिया था वो आजायेगा अब हम लोग यहाँ से किब्बर गांव की ओर चलते हैं।
पर हम दोनों मानने वाले नहीं थे। नीचे कार दिखाई दे रही थी और साफ पता चल रहा था कि नीचे कोई हिलने वाला नहीं था। कई प्रयास किये गए। सीटी का प्रयास असफल होगा ही सभी को पता था क्योंकि ध्वनि हवा के वेग में बह रही थी। हाथ हिलाकर भी अनेकों प्रयास किये गए।

पन्त जी: चलो फिर पिंजर गांव ( मठ में नाम पता चला था) देखकर आ जाते हैं।

थोड़ा चलकर गांव पहुंचे सोचा था पानी तो मिल जाएगा पर इधर तो पूरा गाँव नीचे गया था। मठ के धार्मिक कार्यक्रम में व्यस्त था। 3-4 घरों का ये छोटा सा गाँव अद्भुत ही है। यहाँ पर थोड़ी सी खेती और सेब की हाइब्रिड प्रजातियों के साथ यहाँ रहना। सभी गांववासियों के लिए दिल से नमन करता हूँ।

पूरे गांव में बस एक बिल्ली दिखी जो दूर कुछ और लग रही थी। हमने उसे कुकरी बाघ समझा था। पास पहुंचते पहुंचते सच्चाई सामने आ गई। पन्त जी आगे की ओर किब्बर गांव पैदल चलने की रट लगाने लगे।

हम दोनों समझाते हुए बोले: भाई नीचे चलते हैं कार से चले जायेंगे किब्बर। मठ में बताया था किब्बर यहाँ से कम से कम 7-8 किमी है

पन्त जी : अरे कोई नहीं पहाड़ो में क्या 7-8 किमी.। नीचे की ओर शॉर्टकट होते हैं 2-3 किमी होगा चले जायेंगे। किब्बर में मिल जायेंगे वो लोग। चलते हैं यार तुम लोग तो ऐसा कर रहे हो जैसे पैदल चलते ही नहीं होगे।

माही: अरे दिक्कत ये है भाई कि न पानी है और न हमने खाना खाया है सुबह भी चाय और मैगी खाई थी और नैथानी ने तो वो भी नहीं खाई थी।

पन्त जी ( मुँह लटकाकर ) : चलो यार। मिल तो जाएंगें वो लोग किब्बर या रास्ते पर।

माही और मैं एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। एक बार फिर से असमंजस की स्थिति थी और यहाँ रुककर निष्कर्ष निकालना जरूरी था। 7-8 किमी का रास्ता और शरीर की बैट्री शून्य की ओर अग्रसर थी।

जारी है….

No photo description available.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *