बिस्तर में घुसते ही अभि ने मोबाइल को जिंदा कर लिया लेकिन उसके मुखपटल पर उदासी साफ दिखाई दे रही थी। जिस प्रकार से जिंदगी में उत्साह के अभाव में शरीर के जीवित रहने से कोई खुशी नहीं होती वैसे ही मोबाइल में नेटवर्क न होने पर अभि की खुशी गायब थी। उसे घर बात करनी थी आखिर वो था मम्मा बॉय।

रात्रिभोज में ड्राइवर भैया ने बताया: अगर मौसम साफ रहेगा और रास्ता खुला होगा तो चन्द्रताल तक जाएंगें। आप लोग पैदल चल सकते हैं तो 7-8किमी पैदल चलकर वहाँ पहुंचा जा सकता है। आज एक ग्रुप जाने वाला था पर सड़क बन्द थी। कल देखेंगें एक बार।

प्रातः 6 बजे तेज सर्द हवाओं के साथ कुछ झंडे अपने मंत्रों के साथ लहरा रहे थे इंसान के नाम पर मैं और सिर्फ़ मैं ही था
पीछे से आवाज आयी: इतने ठंडे में बाहर क्या कर रहे हैं? अंदर आ जाओ 9बजे की मोनेस्ट्री को चलेंगें चन्द्रताल की सड़क तो बन्द है। फिर किब्बर गांव चलेंगें वो एशिया का सबसे ऊंची जगह का गांव है।
मैं: सबसे ऊँचा?
ड्राइवर भैया: वैसे तो और भी गांव हैं पर वो अभी रजिस्टर नहीं हुए हैं।

हल्का फुल्का नाश्ता करके कुछ सेब गाड़ी में रखकर प्रातः 10 बजे निकल पड़े की मोनेस्ट्री की ओर। क्या नजारे हैं अद्भुत देखते ही आपका दिन सफल हो जाय। काफी दूरी से ही आप इस मठ को देख सकते हैं। और इतना आकर्षक कि आप मोहित हुए बिना नहीं रह सकते हैं। महत्व इतना कि दलाई लामा जी भी यहाँ आने के लिए उत्सुक रहते हैं। कई प्राचीन हस्तलिपि को संग्रहित किये हुए हैं ये मठ। प्राचीन वेशभूषा, हथियार और यादों को सँजोये हुए ये है एशिया का सबसे ऊँचाई में बना की मठ। यहाँ पहुंचते ही आपका रुख आध्यत्म और भारतवर्ष के इतिहास की ओर झुक जाता है।

पहुंचते ही पता चला कि यहाँ कोई धार्मिक कार्यक्रम है। की मठ के आस पास के सभी गांवजन आज यहाँ पधारे है। सभी मन्त्र पुस्तक से मन्त्र उच्चारण में व्यस्त थे। अंदर जाते ही लामा जी मिल गए और घुमाने के साथ साथ धार्मिक ज्ञान बताने लगे पता चला इसे रिंगछेन सांगपो जी ने बनाया था।

अंदर एक छोटी सी रसोई में बैठे चाय जैसा कोई पेय मिला निम्बू की महक के साथ उसने ठंड और थकान दोनों को छूमंतर कर दिया। ऊपर की चोटी की ओर से कुछ ग्रामीण आरहे थे। अंकित के अनुसार वहाँ चोटी से चित्र लेने पर अद्भुत चित्र आएगा। पूछने में पता चला कि ऊपर एक गांव है। इस कच्चे रास्ते में अधिक चढ़ाई के साथ साथ ऑक्सीजन की भी भारी कमी है। यदि आप लोग जाना चाहते हैं तो रोड से जाएं ।

बौद्ध मूर्ति से चढ़ता हुआ रास्ता दूर से ही कठिन दिखाई देता है। एक विचार बना कि गाड़ी से ही चला जाये पर मन था जो विपरीत दिशा को भाग रहा था। कभी अंकित को तो कभी अभि को देखता और सोचता अगर सच में ऑक्सीजन कम हुई तो इन दोनों को वापस कैसे लाऊंगा। चलो बौद्ध मूर्ति तक चलते हैं फिर देखेंगें। रास्ते में कुछ बच्चे भी थे एक चित्र के आवेदन को उन्होनें सिरे से खारिज कर दिया। वह किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे। इधर अभि ने आगे चलने से मना कर दिया था। उसे बौद्ध मूर्ति तक चलने के लिए जैसे तैसे मना लिया।

जारी है…

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