#स्पिति_घाटी खाब संगम पुल एक अविश्वसनीय मनमोहक स्थान में से एक है। यहाँ आप प्रकृति के सृजनकला का अनूठा रूप देखते हैं। ढेर सारी चित्रों को अपने चित्रखीचन यंत्र में सहेज कर हम नाश्ते के लिए संगम में एकमात्र ढाबे में गए। अब ठंड का एहसास हुआ और जल्द से पहले चाय और मैगी का ऑर्डर दे दिया गया। दिल को नदियों के संगम के एहसास में डूबा कर आगे बढ़ चले। कई मीलों तक इस घाटी व स्पिति नदी को निहारते हुए ख्वाबों की कौन सी दुनिया में खो गए पता ही नहीं चला। घाटी में एक मात्र पंछी बाज उड़ता हुआ दिखाई दिया कई असफल प्रयास हुए इन जनाब के चित्र के लिए। पर प्रयास असफल ही रहे।

हल्के हल्के कार घाटी की चोटी में पहुँच गयी। प्रातः 10 बजे नए नजारों के साथ सूर्यदेव के दर्शन हुए। धूप सेंकने का असली मजा पहाड़ो में ही है। स्कूली बच्चे पहाड़ों को लांघकर स्कूल पहुंचने में व्यस्त थे। सीढ़ीदार नुमा खेती ने एक बार फिर घर की याद दिला दी। चोटियों के ऊपर पड़ी सफेद चांदी चमककर आंखों को सुकून दे रही थी।

नको के रास्ते के समीप से ड्राइवर भैया बोले: लौटते समय नको होते हुए आयेंगे।

कुछ दूरी तय करने के बाद सड़क चौड़ीकरण कार्य के कारण यातायात कुछ समय के लिए बाधित था। बायीं दिशा में स्पिति हमारे बिल्कुल करीब विपरीत दिशा में प्रवाहित थी। मैं और माही तो नदी की ओर पैदल बढ़ चले। इस जगह में सड़क नदी के समीप से गुजरती है। नदी के किनारे जूते उतारकर ज्यों ही स्पिति में उतरे कि पानी ने सीधे गंगोत्री का एहसास करवा दिया। पानी में पैर बेहोशी की अवस्था में पहुंचने ही वाले थे कि हमने पैर बाहर निकाल दिए। बर्फ से अधिक देर तक खेलने के बाद जो जलन होता है वैसा ही अनुभव इस पानी ने करवा दिया।

कुछ देर दोनों ने एकदूसरे के ऊपर पानी से आक्रमण भी किया और हम अपने बचपन में वापस चले गए। पीछे अभि ओर पन्त जी भी आ पहुंचे। थोड़ी देर पानी की बौछार से आपस में अफरा तफरी मच गई। इसके बाद माही और मैंने अभि को पानी में उतरने के लिए उकसाया। और यह कहकर उतरा कि वो भी नीलकंठ ( ऋषिकेश) में झरने में नहाया है। लेकिन ज्यूँ ही पानी में उतरा त्यों ही वापस आते हुए बोला : पानी में आग लग रही हैं। कुछ घण्टों की मस्ती के बाद सड़क खुली और सभी निकल पड़े आगे की यात्रा में।

रंग बिरंगे पतंगों से भरा पुल स्पिति घाटी में काजा पहुंचने का सूचक है। सेब की भरमार से हम सभी की आंखों में सेब के सपने दिखने लगे। एक जगह पर सेब तोड़ते मजदूरों से विनती में कुछ सेब मिल गए पर अभि तो माँगता ही रहा और 3-4 किलो सेब इकठ्ठा करके वापस वाहन में आया। और ऐसे दिखा रहा था जैसे ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता हो। रवि महाराज नीचे की ओर डूबते हुए दिन के ढलने की ओर इशारा कर रहे थे। 4 बजे के बाद के नजारे इस शीत नग्न हिमालय में अद्भुत होते हैं यहाँ ठंड का असर गाड़ी से बाहर निकलते ही पता चलने लगता।

पन्त जी ने एक बार फिर आवाज उठाई ( ड्राइवर भैया से ) : भैया ऐसे जगह रुकना जहाँ हम अपना टेंट लगा सकें।
माही: ओ भाई, ओ भाई बाहर ठंडा तो देख और साथ में हवा। रात में उड़कर नदी में गिर जायेंगे। मै तो नही रुकूँगा।
पन्त जी: जो अभी श्रीखंड गए होते तो?
ड्राइवर भैया: भैया यहां रात में तापमान एकाएक गिर जाता हैं। श्रीखंड में आपको किसी पत्थर या पहाड़ की आड़ मिल जाती जो कि यहाँ पर सम्भव नहीं है। मैं काजा में कुछ होमस्टे जानता हूँ वहीं रुकवा दूँगा।

सभी की चुपी ने हाँ की ओर इशारा किया और आज के अंतिम पड़ाव के लिए निकल पड़े काजा में होमस्टे की ओर। शाम ढलते ढलते अद्भुत नजारों की तिजोरी खुल गई सभी नौजवानों ने एक बार फिर जवानी के जोश में पहले ही सारे कैमरे, मोबाइल फोन्स की बैटरी खत्म कर दी थी। अब सिर्फ इन नजारों को अपने मनपटल पर सुरक्षित करने के अलावा कोई अन्य उपाय न था। और पहली बार इतनी ज्यादा ठंड में खड़े लड़के अभि ने हार मानकर बिस्तर की शरण ले ली।

जारी है 

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