मन व्याकुल था अब तो पता भी नहीं था कि जाना कहाँ है और कहाँ तक जाना है। पहाड़ी रास्ते में अब प्रकृति अपने मनमोहक रंग बिखेरने लगी। मानव निर्मित यह रास्ता भी अलग ही दुनिया में जाने का संदेश दे रहा था। पहाड़ों को काटकर इनके नीचे से रोड का निर्माण अकल्पनीय ख्वाब जो अब एक खूबसूरत हकीकत है। ऊँची चोटी में चलती हुई बस जब जब किनारे लगती तब तब कई फीट गहरी खाई दिखती और अभिनव की जान सांस में अटक जाती। हम उसकी शक्ल देख कर मुस्कुरा देते।

बस में होने के कारण कई खूबसूरत जगह के चित्र लेने में असमर्थ थे। स्थानीय लोग की यही बसें यहाँ की जीवनदायिनी से कम नहीं है।

बस शाम के सुहावने पल में प्रवेश कर रही थी। 20 घण्टे से अधिक का सफर अभी बस में गुजरा है। और मेरा अमूल्य 1 दिन आज बलि चढ़ गया शायद आज हम श्रीखंड महादेव के आधे रास्ते तक पहुंच गए होते। हल्के हल्के बस रिकांगपिओ में पहुँच रही थी। इस समय बौद्ध नगरी स्वर्ण जल में स्नान कर के हमें मोहित करने में प्रयासरत थी। आज का पछतावा खत्म करने का समय आ गया था। खूबसूरत वादियों ने एक बार फिर अपने जलवे के साथ सभी का मन मोह लिया।

हमें किन्नौर जिले से आगे लाहौल-स्पीति जिले में घूमने की तैयारी शुरु करनी थी। बिना रुके आगे चलने का प्रावधान एक झटके में हाँ के साथ पास हो गया। निकल पड़े कार की तलाश में जो हमें आज रात में काजा ले जा सके। सड़क में ऊपर से पत्थर गिरने के कारण रात में कोई भी चलने को तैयार नहीं था। कार स्टैंड में एक भैया मिले और सुबह 4 बजे निकलने और बहुत मोलभाव के बाद 12 हजार में बात बनी। रिकांगपिओ की शाम और ज्यादा सर्द हो गयी। 500 रुपिये में कुछ घण्टों के लिए 2 कमरे मिल गए।

अब हम बौद्ध नगरी में प्रसिद्ध बौद्ध मठ देखने निकल गए। रास्ते में सेब से लदे पेड़ों ने बचपन के दिनों को वापस बुला दिया। मैंने अंकित से सेब चुराने की बात कही तो बौद्ध भगवान का वास्ता देकर मठ की ओर बढ़ा दिया। शांत वातावरण में बौद्ध मूर्ति और उसके आगे हिमालय दर्शन आपका मन मोहकर वहीं पर रुकने को मजबूर कर देते हैं। हिमालय पर गिरती स्वर्ण किरणों का गिरना जारी था।

वापसी में अंधेरा हो गया और अब बचपन ने उबाल मारना शुरू किया और जिद्द में पंतजी को झुकाकर उनके कंधे में चढ़ पेड़ की एक डाल से सेब चुराने लगे। ये सेब तो जिंदगी भर याद रहेंगें इनकी एक बाईट में इतना रस लगा कि जैसे कोई रसीला फल ( सन्तरा ) खा रहे हो। इसके बाद हम बाज़ार की रौनक देख कर कमरों में सोने चले गए।

प्रातः 4 बजे सभी तैयार होकर बाहर निकले तो ड्राइवर भैया तैयार खड़े मिले सभी का 7 सीटों वाली गाड़ी में सेब के साथ स्वागत हुआ। पर कल शाम का सेब तो कमाल था👌( अभी भी याद आ रहा है)।

और कार चल पड़ी दुनिया के सबसे जटिल रास्ते पर ( लाहौल-स्पीति) की सड़क पर। सपाट सड़क से गड्ढे वाली सड़क और फिर वापस सपाट सड़क। प्रातः 4 से प्रातः 5 बज गए और किन्नौर से लाहौल स्पीति जिले में जाने के लिए चेक पोस्ट पर अपने नाम लिखे गए। तभी ड्राइवर भैया ने टायर के सड़क में फैलने की ( पंचर ) खबर बताई। सबसे बढ़िया बात कि ये गाड़ी ( स्कॉर्पियो ) भैया पहली बार चला रहे थे उन्हें पता न था कि इसकी स्टेपिनी कहाँ पर होती है और हमें तो खुद का पता भी नहीं था तो सभी पांचों लोग लग गए टायर बदलने में। लगभग 40 मिन्ट बाद फैले हुए टायर को पीछे रखकर हम लोग आगे बढ़ चले।

चेक पोस्ट में बेठे सैनिक ने सलाह दी : आगे 10-12 किमी पर पंचर की दुकान है टायर का पंचर बना लेना बिना उसके जाने पर आप लोग फंस सकते हो।

पुह के पास प्रातः 7 बजे पंचर के लिए सभी नीचे उतरे लेकिन दुकान बंद थी। सभी बाहर छत पर सूख रहे सेब का लुफ्त उठाने लगे। प्रातः की दौड़ करते बच्चों,युवाओं, सैनिकों की टोली, सुंदर पहाड़ियाँ भी दिखी। पर अभिनव ठंड के कारण 5 मिनट से ज्यादा बाहर नहीं घूम पाया। फोन पर बुलाते बुलाते जनाब प्रातः 9 बजे पुह की धरती में पधारे। पंचर लगवा कर आगे बढे।

सतलुज नदी के किनारे किनारे घाटी की दूसरी दुनिया दिख रही थी। धीरे धीरे पहुँचे खाब संगम – यहाँ स्पिति ( बायीं ओर से ) और सतलुज ( दायीं ओर से ) आकर यहाँ मिलती है।

ड्राइवर भैया बोले : यहां पर आप लोग घूम लीजिये फिर चाय मैगी खाकर आगे चलेंगें।

जारी है …… जल्द ही

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