अचानक एक अनजान नंबर से वोट्स एप मेसेज आया, जो कि अखबार की कतरण थी, शिवपुरी के आदरणीय मोतीचंदजी को देखते ही प्रसन्नता हुई, पढ़ने पर जाना कि दादाजी ने 91 की उम्र में सवा लाख से अधिक णमोकार महामंत्र को महामारी के लोकडाउन के समय में लिखकर स्वयं को मंत्रसाधना में जोडे रखा।
दादाजी की पौत्री निधी और पौत्र अनुभव का मैं तहेदिल से धन्यवाद करती हुं, जिनसे दादाजी की तस्वीरें प्राप्त हुईं।
प्रसन्नता से भर उठा मेरा मन 20 साल पूर्व के द्रश्य को ताद्रश देखने लगा- जो स्कूटर प्रवास के दौरान का मेरा परम सौभाग्य रहा है।
उस समय गुजराती में आलेख लिखा था, आज उसका हिन्दी अनुवाद पूज्य दादाजी को अर्पण करती हूं।
आशा है 91 की उम्र के दादाजी की सकारात्मक सक्रियता देखकर पाठकगण भी इनसे प्रेरणा प्राप्त करेंगे।

स्वकर्मे चमकदार रत्न!

1 मार्च 2000 को राजस्थान का स्कूटर प्रवास पूर्ण करके सवाईमाधोपुर से मध्य प्रदेश के शिवपुरी की ओर रवाना हुए, दोपहर एक बजे के आसपास हम पोहरी पहुंचे। थोड़ा आराम करने के लिए एक पेड़ की छाया में रुके। एक भाई आये और अपना परिचय दिया, बातचीत शुरू की, और हमें एसटीडी काउंटर पर ले गये – चाय पिलाई ‌। अभिवादन किया।
आज रात शिवपुरी में कहाँ ठहरेंगे वह निश्चित नहीं है ऐसा कहते ही, उन्होंने महल कॉलोनी स्थित जिनालय में पहुँचने के लिए कहा। कुंवर अरविंद तोमर के शब्दों को स्वीकार करते हुए, हम लगभग 3- 3.30 बजे वहां पहुंच गए। इस विस्तार से हम बिल्कुल अपरिचित थे। अजनबी शहर – अजनबी स्थल – अजनबी व्यक्ति!
खूबसूरत मुस्कान के साथ स्वागत हुआ। तुरंत ठहरने की सारी व्यवस्था कर दी और शिवपुरी के दर्शनीय स्थलों की जानकारी दी। हम तुरंत बाहर निकले। घूमकर रात में लौटे और 2 मार्च को दूसरे दिन शिवपुरी से रवाना हो गए – लेकिन मन में कई प्रेम-स्मृतियों को साथ लेकर! मंदिर के अध्यक्ष श्री मोतीचंदजी जैन की जो 71 साल के थे उनकी सक्रियता और काम करने की लगन / भावना / चातुर्य अद्भुत था। हम तो उन्हें जानते भी नहीं थे । दोपहर का समय था इसलिए कोई नौकर नहीं थे, शायद भोजनादि के लिए घर गये होंगे, तो वो खुद कमरे में झाडू लगाने लगे। भला बुजुर्ग के पास ऐसा काम कराना कौन चाहेगा? भले ही हमने बहुत आनाकानी की, लेकिन उन्होंने पीने का पानी भी भर दिया – हमें देर रात यह पता चला कि वे एक मुनीम नहीं बल्कि मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष थे, इसलिए बहुत ही साधारण जीवन जीती इस व्यक्ति को देखते हुए, “Simple living and high thinking” “सरल जीवन और उच्च विचार” की याद आ गई।
उन्होंने मुझे शिवपुरी में ‘योग शिविर’ के लिए आमंत्रित किया – और हम वापस 14-6-2000 को पहूंच गये। 17-6-2000 से 26-6-2000 तक योगाभ्यास शिविर का आयोजन हुआ। “स्वयं स्वस्थ बनो अभियान भारत” की मध्य प्रदेश की यह प्रथम शिविर! इस शुभारंभ के बाद मध्य प्रदेश के कई स्थानों में अभियान आज भी कार्यरत है।
शिविर के दौरान १५ दिन उनके नज़दीक रहे। उनके स्वभाव की ऋजुता/निर्मलता हमारे मन में अंकित होती गई।। संस्था के प्रत्येक कार्य में उनकी तत्परता। चाहे वह टोयलेट-बाथरूम को साफ करना हो, सीढ़ियों को पानी से धोना हो, माइक को फिट करना हो या कालीन बिछाना हो – ऐसे तो अनेक ​​साधारण लगने वाले छोटे-छोटे काम भी उतने ही जोश के साथ करते थे जितना कि भगवान की पूजा और अभिषेक करते हों। मंदिर परिसर को बहुत साफ रख रहे थे। किल से लेकर हर छोटी और बड़ी आवश्यकता उनके पास तुरंत मिल जाती – बाद में या देखेंगे – जैसी कोई बात उनके पास नहीं थी।
हमारी छोटी सी छोटी बातों का ख्याल रख रहे थे। भोजन या आवास इतना ही नहीं – कपड़े धोने से लेकर इस्त्री तक की व्यवस्था भी मौजूद। पेपर-पेन-पेंसिल-डेली अखबार-तेल -साबून-मच्छरदानी से हर चीज का व्यक्तिगत रूप से ख्याल रखते थे। शिविर के लिए बहुत उत्साही भी, जो भी कुछ चाहिए उसे देने के लिए पूरी तत्परता। कुछ भी करते वक्त पूछने पर मुस्कराहट से आप कहते हैं! “कुछ भी करो, खर्चा के बारे में चिंता मत करो।” – पूरे विश्वास और आत्मविश्वास के साथ बोले गए उनके शब्द ही हममें नयी हिम्मत/ चेतना ही जगा देते थे!
शिवपुरी में देखने लायक हर जगह पर स्वयं साथ चलकर मार्गदर्शन करने के साथ-साथ कई तरह की ऐतिहासिक / पौराणिक/ वर्तमान जानकारी का खज़ाना परोस देते थे।
ऐसे प्यारे दादाजी की जिनालय के प्रति प्रीति भी अद्भुत ! यह जिनालय उनके विद्वान और मुत्सद्दी भाई स्व. श्री नेमीचंदजी गोंदवाले का सपना था। इस सपने को सच करने के लिए, नेमीचंद भाई ने अपने जीवन की पूरी संपत्ति का बलिदान कर दिया था। आज, उस भाई की अनुपस्थिति में, दो अन्य भाइयों, श्री राजारामजी और श्री चन्द्रसेनजी के सहयोग से, श्री मोतीलालजी ने स्वयं को जिनालय के लिए समर्पित किया है। यह जिनालय आगरा-मुंबई राजमार्ग पर शिवपुरी के सुरम्य क्षेत्र महल कॉलोनी में स्थित है।
यह भव्य जिनालय महावीर जिनालय के नाम से प्रसिद्ध है। जिनालय में मूलनायक अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का पद्मासनस्थ मनोज्ञ अचल प्रतिबिंब स्थापित है। मूर्ति के मुख पर स्थित हुए शांत भाव अपने आप वंदन के लिए प्रेरित करते हैं। मूलवेदी में चल प्रतिमाजी भगवान नेमिनाथजी की है।
इस जिनालय का प्रतिष्ठा महोत्सव 11 से 15 फरवरी 1973 विक्रम संवत 2029 में आयोजित किया गया था। श्री मोतीचंद दादाजी को शुरू से ही अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया है। इतने लंबे समय तक इस तरह के एक जिम्मेदार काम को अंजाम देना आसान नहीं है पर मंदिर के मुख्य संस्थापक और उनके गुरुभ्राता विख्यात विद्वान श्री नेमिचंदजी गोंदवाले द्वारा लघुभ्राता में रखा गया भरोसा आज भी बरकरार है और उन्होंने अध्यक्षपद को निभाया है – प्रकाशमान किया है।
महावीर जिनालय के ठीक सामने एक बड़ा मानस्तंभ बनाया गया है। इसे दूर से देखते ही दर्शक अभिभूत हो जाते हैं।
जिनालय का गर्भगृह विशालकाय प्रवचन-मंडप में स्थित है। यह 5400 वर्ग फुट का है। जिसमें तीन हजार लोग आराम से बैठ सकते हैं और प्रवचन का लाभ उठा सकते हैं। प्रभु दर्शन के साथ साथ प्रवचनों को सुनने का लाभ मिल सके ऐसा सुंदर विचारशील निर्माण है।
स्वाध्याय के लिए एकांत की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए एक स्वतंत्र स्वाध्याय मंदिर भी बनाया गया है। जिसमें विपुल धर्मग्रंथ संग्रहित किये गये हैं जिससे साधक इस सरस्वती भंडार का उपयोग स्व-अध्ययन के लिए उपयोग कर सकते हैं।
इस परिसर में छात्रावास का आयोजन करके छात्रों में आचार-विचार सम्पुष्ट और उच्च बने उसकी खेवना रख आयोजकों ने अपनी दीर्घ दृष्टि का परिचय प्रस्तुत किया है।
तीर्थयात्रियों के लिए विश्राम गृह में 12 कमरे हैं – जिसमें हमें उतारा दिया गया था। यहां भोजनालय नहीं है। यात्री के स्वयं पाक कर सके वैसी सभी सुविधाएँ हैं। एक बड़ा हॉल है जहाँ समूह में यात्री ठहर सकते हैं।
यहां के बाल पाठशाला में बच्चों को धार्मिक शिक्षा, उचित आचरण, विचार-अनुशासन के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास का प्रशिक्षण दिया जाता है।
शिवपुरी में दिगंबर जैन के 600 और श्वेतांबर जैन के 70 घर हैं। दिगंबर के पांच मंदिर और श्वेतांबर के दो देरासर हैं।
Active againg का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रदान कर रहे श्रद्धेय मोतीचंद दादाजी, न केवल जिनालय के अध्यक्ष के रूप में व्यवस्था प्रणाली को संभालते हैं, वे एक धार्मिक पुजारी हैं जो प्रतिदिन सुबह जिनालय में अभिषेक करते हैं, सुमधुर भजनों के गायक हैं, गरीबों के बेली हैं, बच्चों को प्यार बरसाते दादाजी हैं, संयुक्त परिवार के कुशल मुखिया हैं, कुशल व्यापारी हैं, वह जटिल मरम्मत के मैकेनिकल इंजीनियर है, निर्माण में प्रवीण हैं, सिविल इंजीनियर/आर्टीटेक्ट है, वे एक वास्तुकार है, वे मांडला या पूजनादी के अवसर पर विभिन्न बैनरों आदि के अच्छे चित्रकार हैं, वे एक प्रसिद्ध चिकित्सक है जो चर्मरोग का इलाज करते हैं, वे स्वाध्यायी हैं, कई जानकारियों के संग्रहकर्ता हैं और विशेष रूप से यह निस्वार्थ और आत्मनिर्भर दादाजी साधना के पथ पर कदम बे कदम आगे बढ़ने के लिए कटिबद्ध हैं।
चर्म रोग जैसे कि दाद-खाज-खुजली-मवाद जैसी
लाइलाज बीमारियों को दादाजी एक पत्थर की दवा से ठीक करते हैं। इस दवा को लेने के लिए आने वाले मरीज दादाजी को बहुत आशीर्वाद देते हैं। इस दवा को लेने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं जो मुफ्त में दि जाती है और चर्म रोग से थका हुआ, खोया हुआ, उदास व्यक्ति त्वचा रोग से ठीक हो जाता है।
उनके सर्वश्रेष्ठ गुणों का ‘पाथेय’ प्राप्त करने के बाद शिवपुरी के मेरे इस निवास से वास्तव में मैं धन्य हुई।

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