सितम्बर माह के अंत में मानसून जाने को था और मेरे मन में घूमने की इच्छा प्रबल रूप से ज्वलित हो रही थी। अपनी टोली से बात की गई पूर्व भारत का कार्यक्रम बनता तो कभी बिगड़ता। Mahendra ( माही) और मैं असम, सिक्किम का सोच रहे थे। Ankit हिमाचल की ओर झंडा लहराने की सोच रहा था। और अंत माही ने करवट बदल ली, अब दोनों मेरे विपक्ष में खड़े थे।

मोबाइल की घण्टी बजी उधर से आवाज आयी
माही : अरे नैथानी कहाँ जा रहा है?
मैं: भाई अपने ने असम या सिक्किम सोचा है।
माही: हम तो हिमाचल जा रहे हैं। अंकित से बात कर ले।
अंकित : अरे नैथानी जी चलो। हिमाचल में श्रीखंड महादेव जायेंगे। 20 किमी का पैदल ट्रैक भी है

इन कम्बख्तों को मेरी कमजोरी का पता है तो लोहे पर हथौड़ा कहाँ मारना है वो पता रहता है। पैदल ट्रैक का नाम सुनते ही हिमाचल की ओर रुझान के साथ ट्रेक की जीत दर्ज हो गयी। स्लीपिंग बैग, टेंट, गर्म कपड़े पैक हुए । और निकल पड़े श्रीखंड महादेव के लिए।

28 सितम्बर शाम को पता चला कि अंकित एक नौसिखिए दिल्ली के यो यो बालक अभिनव को हमारे साथ ट्रैक पर लाया है। और वो भी बिना ट्रेकिंग बैग व सामान के। कश्मीरी गेट से निकल पड़े अपनी मंजिल की ओर। शाम 8-8:30 बजे रिकांगपिओ की बस मिली। एक दूसरे को देख तीनों ने हेप्पीडेन्ट के एड जैसे दांत चमका दिए। अंधेरे में बस ने रफ्तार पकड़ी और पानीपत,करनाल, चंडीगढ़ होते हुए सुबह शिमला पहुँच गयी।

कई बार मेरा शिमला जाने का मन हुआ पर इन लोगों ने यह बोलकर मन मार दिया मेरा कि : क्या यार नैथानी अब तू शिमला जाएगा, शो ऑफ करना है क्या तुझे?, इससे बढ़िया तो नैनीताल है कम से कम वहाँ ताल तो है शिमला में तो बस भीड़ भाड़ है और हमें तो सुनसान- सन्नाटे में जाना होता है जहाँ बस हम और हमारी आत्मा हो बस!

फिर मेरा कार्यक्रम स्थगित हो जाता पर आज तो सुबह 5:30 बजे बस ने शिमला में प्रवेश कर लिया। और न चाहते हुए भी थोड़ा सा
शिमला मैने भी छू ही लिया। अब दोनों ज्ञानी वर्ग उठकर मुझे अंगुली के इशारे से शिमला घूमाने लगे। वो उधर से मालरोड को जाते हैं, वो हनुमान जी की मूर्ति बड़ी सही जगह पर है, उधर से नजारे कमाल के दिखते हैं और भी पता नहीं क्या क्या। आगे के सहयात्री मुझे पहली बार घूमने वाला समझ रहे थे। जब भी सहयात्री देखते तो मैं मुँह फाड़कर दाँत दिखा देता।

बस हल्के हल्के शिमला के अंतिम छोर को छोड़ने लगी।और बस में स्थानीय लोग आते गए। स्कूली, कॉलेज, रोज आवन जावन वाले यात्री भर गए। कुछ और पर्यटक भी आ गए जो रिकांगपिओ से स्पिति , काजा जा रहे थे।

उनमें से एक ने हम से पूछा : आप लोग भी काजा जा रहें हैं क्या?
अंकित: नहीं हम तो रामपुर तक जाएंगें। उसके बाद हमने श्रीखंड महादेव जाना है।
पर्यटक: पर यात्रा तो बन्द हो गयी है।
अंकित : हाँ हमें एकांत में ही जाना है।

वार्तालाप सुनते ही एक स्थानीय युवक बोला: आपने चार दिन पहले समाचार नहीं देखे वहाँ तो बर्फ गिरी थी। रोहतांग – लेह वाले रास्ते में फौज पर्यटकों को हेलीकॉप्टर द्वारा निकाल रही है।
कुछ रुककर वह फिर बोला : वैसे उस दिन से मौसम खुला हुआ है शायद बर्फ पिघल गयी हो।

मेरे तो कान खड़े हो गए। एक तो बर्फ ऊपर से 1टेंट,3 स्लीपिंग बैग, और बन्दे चार। मैंनें अंकित की ओर देखा।

अंकित ( आंख मारते हुए) : अरे नैथानी जी किराये पर ले लेंगें। don’t worry.
अब मैंने अभिनव की शक्ल देखी और सोचने लगा कि क्या इससे पैदल ट्रैकिंग हो जाएगी या हम अंकित को इसके साथ वापस भेज देंगें।

स्थानीय युवक ने बर्फ की चोटी दिखाते हुए बताया कि आपको वहाँ जाना है। जाना कठिन है पर कोई गाइड हो जाये तो जा सकते हो। आगे रास्ते के बारे में तो आप को स्थानीय लोग ही बता सकेंगें।सोचते सोचते 11- 11:30 रामपुर आ गए और अब शुरू हुई तलाश जाओं गांव के बस की।

रामपुर के बस अड्डे की ढलान में जाओं गांव की बस नीचे को तेजी सरकते हुए आई और तेजी से गोल घूमकर सीधी ऊपर की ओर मुँह करके खड़ी हो गई।

ड्राइवर भैया से मैने तैश में बोला: भैया जाओं गांव जाना है। श्रीखंड महादेव को जा रहे हैं हम।
ड्राइवर ( मुस्कुराते हुए) : पर बस वहाँ तक मुश्किल ही जाएगी। बर्फ बहुत गिरी है। 4-5 किमी और पैदल चलना पड़ेगा। साथ ही कोई गाइड करो जो तुम्हें वहाँ तक पहुंचा दे।
( अब होश जमीन पर आए ) और नम भाव से आवाज निकली : भैया आप ही कोई गाइड की व्यवस्था करवा दो आप का तो रोज का आना जाना है।
भैया ने भी 8-10 फोन खड़का डाले पर सब का 1 ही जवाब अभी नहीं जायेगें।
फिर वो खुद बोले : भाइयों वहाँ चले भी गए तो अंतिम मंजिल तक नहीं जा पाओगे बहुत बर्फ गिरी है। मंजिल तक नहीं पहुँचे तो फायदा क्या।

पर हमने तो मन बनाया हुआ था तो हम किराये के टेंट व स्लीपिंग बैग की तलाश में लग गए। जिससे भी पूछ्ते वो उल्टा हमसे कहाँ जा रहे हो पूछ लेता। और श्रीखंड ना जाने का ज्ञान भी दे देता। थक हारकर हमने कार्यक्रम रद्द कर दिया। और दूसरे विकल्प खोजने लगे। रिकांगपिओ की बस सामने खड़ी थी और चारों ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर बैठ गए रिकांगपिओ की बस में।

और शुरू हुई यात्रा

#स्पिति_घाटी की

जारी है….

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