….तुंगनाथ पैदल रास्ते की पहली दुकान पर हम पहुंच गए हैं। रास्ते के बांये ओर घने जंगल को उसकी सीमाओं से आगे बढ़ने से रोकता खूबसूरत बुग्याल ( ऐल्पाइन मेडोज- वृक्ष रेखा और हिम रेखा के बीच नर्म घास का ढ़लुवा मैदान ) फैला है। ऊंची आवाज में स्पीकर आन करके कई युवा जहां – तहां, नाच – गाना कर रहे हैं। ऐसे पर्यटकों को सोचना चाहिए कि वे प्रकृति की शांति में आये हैं, न कि उसे अपने भौंडेपन की आवाजों से अशांत करने।

स्थानीय पहाड़ी आदमी उच्च हिमालय में चलते हुए ऊंची आवाज में बात करने से भी परहेज करते हैं। लोक व्यवहार में घने जंगलों में रंग – बिरंगे कपड़े पहन कर जाना मना होता है। ऊंची चोटी और जंगल से गुजरती हुई बरात के बाजे बजाना भी निषेध है। किवदंती है कि आंछरियां ( अप्सरायें ) हर ( अपहरण ) लेती हैं। उच्च हिमालय की संवेदनशीलता भंग न हो, हमारे पूर्वजों ने लोक ज्ञान और कथाओं के जरिये ऐसे कड़ी परम्परायें बनायी थी। आज उनका पालन करने की भी हममें समझ नहीं है।

इस सीजन में पिछले दो दिन से ही लोग यहां आना शुरु हुए और जगह – जगह पर बिखरा प्लास्टिक ‘हम नहीं सुधरेंगे’ का संदेश हमको दे रहा है। रास्तों के आजू – बाजू ही नहीं दूर – दूर तक वह लुढ़का और दुबका पड़ा है। और, रोकने वाला कोई नहीं। वैसे, तीखी चढ़ाई के मोड़ों पर जगह – जगह पत्थरों के घेरे के अंदर कूड़े को एकत्र किया गया है। ये अच्छी शुरुआत है। समझदार लोग उसमें कूड़ा डाल भी रहे हैं। परन्तु दुष्टों की अराजकता को कौन रोकेगा?

मेरा चिंतन इस ओर भी है कि, पारस्थितिकीय दृष्टि से अनुकूल परस्थितियों के परिणामस्वरूप ऊखीमठ से तुगंनाथ क्षेत्र कई दुर्लभ वनस्पतियों का जन्म स्थान है। रिखचोरू, मांसी, चोरू, लकड़धूप और वन तुलसी इनमें प्रमुख हैं। इस कारण इस क्षेत्र की संवेदनशीलता और भी महत्वपूर्ण है। अतः यहां के प्राकृतिक पर्यावरण को बचाये रखना बेहद जरूरी है। हम यात्रा और पर्यटन के नाम पर इसकी अनदेखी नहीं कर सकते हैं।

नीतू का कहना है कि ‘‘स्थानीय लोगों को इसमें सबसे पहले पहल करनी चाहिए। सरकार और पर्यटक तो बाद की बात है। वो तो ऐसे ही आते – जाते रहेंगे। सही बात तो यह है कि स्थानीय दुकानदारों, घोडेवालों और पूजा से जुड़े लोगों की सक्रियता ही इसे रोक सकती है। यदि वे संकोच छोड़कर कूडा फैलाने वाले पर्यटकों को उसी समय सीधे – तुरंत टोक दें तो ऐसा करने में उन्हें संकोच होगा। वैसे, अधिकांश पर्यटकों की कोशिश रहती है कि उनसे इन जगहों की गंदगी न बड़े, पर रास्तों में उचित दूरी पर डेस्टबिन तो हों। यहां तो माशा-अल्लाह, कुछ ने जमीन को हीे डेस्टबिन समझ लिया है।’’

आने – जाने वाले लोगों में ज्यादातर युवा हैं। मेरे जैसे गिनती के ही हैं। तीर्थयात्रा से ज्यादा पर्यटन का भाव अधिकांश के चेहरों पर है। तीखी चढ़ाई पर आक्सीजन का लेवल कम होता जा रहा है। अतः चलने में दिक्कत तो होगी ही। साथ के तीनों युवा यात्री साथी पस्त हैं। मैं बताता हूं कि ‘‘चढ़ाई चढ़ते हुए ऐड़ियों और उतराई में पंजों पर अपना ज्यादा घ्यान और वजन रखना चाहिए। साथ ही कोशिश करें कि बार – बार बैठें नहीं, इसके बजाय हर दस कदम चल कर पांच सैंकिड का खड़े – खड़े विराम लें। इससे थकान पर नियंत्रण के साथ ही नजदीकी सौंदर्य को आप अच्छी तरह निहार भी सकते हो।’’

एक लम्बे फेर के बाद की इस धार से तुंगनाथ मंदिर परिसर नजर आने लगा है। दांयी ओर पगडंडी से सटी दो दुकानें हैं। अक्सर इसमें चहल – पहल रहती थी। आज उदासी में उसके द्वार भिड़े हुए हैं। यहां – वहां पसरे यात्री ये सोच कर बैठें हैं कि अब तो आ ही गए, तुंगनाथ। बांयी ओर की धार पर हैप्रेक स्टेशन देखकर आशीष उसके बारे में जानना चाहता है। मेरे मोबाइल में विराजमान हैप्रेक के वैज्ञानिक डाॅ. विजयकांत पुरोहित के आलेख को पढ़कर, मैं उसे बताता हूं कि ‘‘तुगंनाथ क्षेत्र मक्कू ग्राम पंचायत के अन्तर्गत शामिल है। उच्च हिमालय में पायी जाने वाली औषधीय और सगंध पौधों के संरक्षण, संवर्धन एवं कृषिकरण करने के उद्धेश्य से गढ़वाल विश्वविद्यालय और मक्कू ग्राम वन पंचायत के आपसी सहयोग से सन् 1988 में अल्पाइन शोध केन्द्र, तुगंनाथ ( ऊंचाई समुद्रतल से 3400 मीटर ) की स्थापना हुई थी। वर्तमान में इस केन्द्र में जटामांसी, अतीस, बरमूला, कीड़ाजड़ी, कुटकी, चोरू, डोलू, ब्रहृ्मकमल, मीठा, भोजवृक्ष, हत्थाजड़ी, चिरायता आदि अनेकों औषधीय और सगंध पौधों पर विविध शोध कार्य किए जा रहे हैं।’’

पहाड़ की यह ऊंची धार तुगंनाथ होते हुए चंद्रशिला तक दिखाई दे रही है। रास्ते के दायीं घाटी ओर भीमकाय फन फैलाये कई विशाल चट्टानें हैं। घाटी की गहराई इतनी कि देख कर ही मन में हिर्र हो जाती है। जहां तक हिम्मत है, वहां तक लोग उनमें चढ़कर अलग – अलग करामात करते दिख रहे हैं। मुझे याद आया परम मित्र जयप्रकाश पंवार ने अपने लेखों में इन चट्टानों को ‘टाइगर हिल्स’ का नाम दिया है।

थकान से चूर, मेरे पास के पत्थर पर बैठता हुआ एक युवा मुझे देखते हुए कहता है कि ‘‘यह दूसरी ही दुनिया है। हम तो बेकार की दुनिया में रहते हैं।’’

‘‘दूसरी दुनिया नहीं, यही दुनिया है। प्रकृति ने तो ऐसे ही रची थी दुनिया, हमारे लिए, हमीं ने उसे बनावटी आवरण पहना दिया है। इसलिए, दिक्कत अपने अंदर है, प्रकृति में नहीं’’ मैं उससे कहता हूं।

रास्ते के दांई ओर पत्थरों में सिमटा हुआ गणेशजी का छोटा सा मंदिर है। गणेश जी के मंदिर से आगे बढ़ना माने हम मंदिर परिसर में हैं। रास्ते के दोनों ओर इधर – उधर जहां भी समतल जगह मिली वहां छोटे – छोटे पत्थरों को एक के ऊपर एक बड़ी सावधानी में रखा गया है। पत्थरों से बनी ऐसी छोटी – बड़ी कई मीनारें हैं। अक्सर इनको यहां आने वाले यात्रियों ने अपनी मनौती को पूरा होने के विश्वास के साथ बनाया है। एक मनौती का एक पत्थर। मनौती पूरा होने पर वो दुबारा यहां आते भी हैं। आस्था के प्रतीक इन पत्थरों को आत्मीय धन्यवाद देने के लिए। ‘गता नु गति को लोको’ कहावत की तरह, कभी किसी ने ऐसा किया और कहा होगा, अब वह परम्परा ही बन गई है। मानवीय विश्वास के कई रूपों में एक यह भी है।

पगडंडी के दोनों ओर दुकानों की लम्बी कतार है। ज्यादातर अभी खुलने के लिए ठीक – ठाक की जा रही हैं। दुकानदारों के चेहरे पर कोई विशेष रौनक नहीं हैं। ये सीजन तो ऐसे ही गया। बचे हुए सीजन में कितना हाथ लगता है? मंदिर परिसर में ही यात्रियों चहल-कदमी है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में विराजमान मूर्तियां सीकचों में बंद हैं। दूर से उनके दर्शन संभव हैं। साफे से मुंह – नाक ढ़के सकुचाये पंडित जी भक्तों पर पिठाई भी नहीं लगा रहे है। प्रसाद बाहर बड़े थाल में रखा है। भक्तगण स्वयं ही प्रसाद को ग्रहण कर रहे हैं। कोरोना के कारण ये सब जरूरी भी है। पर मास्क पहने भक्तगण कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। फोटो खींचने की लालसा ने यहां पर कोरोना के डर को मात दे दी है…….

यात्रा जारी है……
डाॅ. अरुण कुकसाल
यात्रा के साथी-
आशीष घिल्डियाल, नीतू घिल्डियाल, हिमाली कुकसाल

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