….दुग्गल बिट्टा से चोपता 7 किमी. है। पहाड़ की ऊंची चोटी से चोपता चुपचाप हमको देख रहा है कि, आज उसके पास कौन – कौन मेहमान आ रहे हैं। चोपता तक फैले घने जंगल में जगह – जगह घास के ढ़लवा मैदानों में जहां – तहां रंग – बिंरगे टैंटों की बस्ती है। सड़क के दांये – बांये से ये आबाद होने लगे हैं। यह पूरा क्षेत्र केदारनाथ वन्यजीव सैंन्चुरी के अन्तर्गत है। इसलिए स्थाई निर्माण कार्यों पर पाबंदी है। वरना यह वन्यता कब की हड़प गई होती।

पिछली बार की तरह दुग्गल बिट्टा से चोपता पैदल जाने का मन है। पर इस बार ऐसे मन – मुताबिक यात्रा साथी साथ नहीं है। मन की बात मन में सजों कर रख दी है, ये सोच कर, फिर कभी?

‘‘बिट्टा तो खेत और रास्तों के किनारे के ऊंचे झाड़ीनुमा जगह को कहते हैं।’’ हिमाली ने ज्ञान की बात कही है।

‘‘सही बोला आपने, छोटे – छोटे पहाड़ी किनारों के आपसी मिलन स्थल में उभरे स्थान को बिट्टा कहा जाता है।’’ मैं हिमाली के ज्ञान को परिष्कृत करता हूं।

‘‘बचपन में दादी ने खेत के बगल के बिट्टे में मुझे बिठा दिया था। और, खुद खेत में गुड़ाई करने लग गयी। मैं खेलते – खेलते अचानक धड़ाम से उस बिट्टे से गिरी तो खूब चोट आयी थी’’ हिमाली अपनी याद को वीडियो में भी कैद कर रही है।

चलती गाड़ी के बांये ओर इस पहाडी धार की तलहटी तक का दृश्य है। खेत, मकान और जंगलों का घनापन पहाड़ के निचले हिस्से से ऊपर की ओर कम होता नजर आ रहा है। बादलों की चहल – कदमी भी हमसे नीचे ही सिमटी हुई है। पक्षियों के झुंड के झुंड हवा में आदमियों के पैराग्लाईडिंग खेल की तरह करामात दिखाने में हैं। धार ही धार सीधी सड़क पर लम्बे फेर के मोड़ के बाद बांयी ओर देवरियाताल ( ऊंचाई समुद्रतल से 2438 मीटर ) को रास्ता है। खूबसूरत देवरिया ताल में बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री, गंगोत्री, चौखम्बा, त्रिशूल, नीलकंठ आदि पर्वत शिखरों के प्रतिबिंब दिखाई देते हैं।

अब हम चोपता ( समुद्रतल से 2900 मीटर ऊंचाई ) की सरहद में हैं। चोपता को ‘छोटे स्वीजरलैंड’ नाम की प्रतिष्ठा मिली है। पर मेरा मानना है कि चोपता केवल चोपता है, अदभुत और अनुपम। फिर कोई और नाम उस पर हम क्यों चस्पां करें?

ऊखीमठ से दुग्गल बिट्टा अथवा गोपेश्वर से कांचुलाखर्क होते हुए चोपता पहुंचा जाता है। एक ओर ऊखीमठ से 30 किमी. और दूसरी ओर गोपेश्वर से 45 किमी. की दूरी पर चोपता स्थित है। चोपता से 3 किमी. की पैदल चढ़ाई के बाद तुंगनाथ है। तुंगनाथ से 2 किमी. ऊपर की ओर चलकर चन्द्रशिला है।

तुंगनाथ और चन्द्रशिला जाने – आने का बेस कैंम्प है, चोपता। चारों ओर गाड़ियां ही गाड़ियां। आदमी कम, गाड़ियां ज्यादा दिख रहीं हैं। ज्यादातर पर्यटक अपनी कार, टैक्सी और बाइक से यहां आये हैं। आगे – पीछे जाम की स्थिति है। पर्यटक और स्थानीय दुकानदार ही व्यवस्था बना रहे हैं। सरकारी अमला कहीं नजर नहीं आता है। सरकार यात्रा प्रारम्भ करने की घोषणा करने तक ही अपनी जिम्मेदारी समझती है। उसके बाद ‘सटक सीताराम’ जैसी झम्मपत ( लापता ) हो जाती है। खाने – पीने के रैस्टोरैंट – ढ़ाबों के बाहर लोगों की भीड़ है, पर अंदर ग्राहक नदारत हैं।

‘‘चलो यार, कुछ खा लेते हैं, कब तक कोरोना से डरेंगे? ये कोरोना वैसे तो नहीं, पर भूखा जरूर मार देगा। अभी खतरनाक चढ़ाई भी चढ़नी है।’’ एक नौजवान अपने साथी को खींचता हुआ ढ़ाबे के अंदर ले आया है।

‘‘अरे साब, ये देवभूमि है, यहां कोरोना – फोरोना कुछ नहीं आ सकता’’ परांठे सेंकता दुकानदार की नजरों में हम भी हैं।

‘‘पर भगवान तो मंदिर में बंद है, आजकल।’’ किसी ने कहा है।

‘‘हां, वो तो सुरक्षा रखनी ही पड़ती है। पता नहीं कौन कहां से आ रहा है? दुकानदार नरमी से कहता है।

चोपता से तुंगनाथ पैदल जाने वाले रास्ते के गेट पर घोड़े वाले अपने ग्राहकों पर पैनी नजर बनाये हुए हैं। घोडे पर जाना – आना 1000 रुपये और केवल जाना 600 रुपये भाड़ा है। तुंगनाथ की ओर अभी दो – चार दिन से ही टूरिस्ट आना शुरू हुए हैं। दिवाली तक ही सीजन है, इसलिए पर्यटकों को रिझाने की होड़ और बेसब्री सबमें है।

तुंगनाथ आना – जाना कई बार हुआ है। रास्ते के बिसौंण ( थक बिसारने ) की सारी जगह याद है। फिर भी हर बार लगता है कि यहां पहले बार आ रहा हूं। सब इतना आर्कषक कि जैसे इस बार ही उससे मुलाकात हुई है।

हमारे आगे हैदराबाद से आये युवाओं का एक ग्रुप चल रहा है। हिमाली हैदराबाद में रही है। वह साथ चल रहे युवा से तेलगू में काम-चलाऊ बात करती है। कुछ लोग घोड़ों पर है। चढ़ाई तीखी है। इसलिए सभी आस-पास ही धीरे- धीरे चल रहे हैं।

तुगंनाथ का पूरा रास्ता बुरांस, बांज, कैल और देवदार के घने जंगलों का है। जैसे – जैसे हम ऊपर की ओर आ रहे हैं बुरांस के पेड छोटे और झुके नजर आ रहे हैं। ऊपरी जगहों पर अधिक बर्फ गिरती है, इस कारण अधिक समय और मात्रा में बर्फ लदने के कारण वे झुक जाते हैं। तब, वह झाड़ियों के रूप में दिखते हैं। इस रास्ते में आने – जाने वालों की चहल कदमी के साथ ही अनेकों तरह की पक्षियां की आवाज से भी रास्ता गुलजार है। तभी तो, यह ट्रेक वर्ड वाचिंग के लिए मशहूर है।

मेरे आगे – आगे घोड़े की लगाम थामे घोडेवाला उस पर विराजमान थुलथुले पर्यटक से राह चलते – चलते बात हो रही है। घोड़ेवाला कह रहा है कि, ‘‘ ‘केदारनाथ’ पिक्चर की शूटिंग इसी तुगंनाथ रास्ते पर हुई थी। मैं आपको बताऊंगा कि किस जगह पर क्या डायलाग बोले गए। नाच – गाना भी हुआ था, साब। एक्टरों को भौत मेहनत करनी पड़ती है। हम तो सोचते थे कि ऐसे ही बन जाती होगी पिक्चर। पर हर बार कट – कट – कट ही हम सुन रहे थे। उन दिनों हम तो सूटिंग देखने में मस्त थे, पर हमारे घोड़े बेचारे बहुत परेशान हुए। कई बार उनको थोड़ा सा चल कर कट करते ही फिर पीछे लाना पड़ता था। इससे घोड़े झुंझला और थक जाते थे। घोड़े को आगे चाहे जितना ले जाओ, पर पीछे मुड़ना उसे पंसद नहीं होता है। बहुत अच्छी पिक्चर थी, साब। लोगों ने बेकार में विरोध करके ‘केदारनाथ’ फिल्म को बंद कराया। यहां की खूबसूरती को दुनिया के लोग देखते। इस इलाके का फैदा ही होता। पर हमारे लोगों में इतनी समझ कहां है, साब? वो हीरो सुशांत राजपूत भी मर गया, बड़ा बुरा हुआ, साब। भौत मिलनसार आदमी था। मैंने तो कई बार हाथ मिलाया उससे….आप तुंगनाथ में रहना तब तक मैं एक चक्कर नीचे करके आ जाऊंगा…. आप चिन्ता मत करना साब,…. सामने चौखम्बा, त्रिशूल, केदारनाथ की चोटी है, वहां इस बार बर्फ बहुत कम है।….यहां आदमियों का नहीं, जानवरों का डर हुआ, और, वो भी हमको जानते हैं….तुंगनाथ से चन्द्रशिला जरूर जाना साब, वहां नहीं गए तो क्या गए तुंगनाथ….’’ घोडेवाले का बोलना जारी है….
डॉ. अरुण कुकसाल
यात्रा के साथी-
आशीष घिल्डियाल, नीतू घिल्डियाल, हिमाली कुकसाल

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