4 अक्टूबर, 2020
….गुप्तकाशी के सिरहाने पहुंचकर चांद, रात की यात्रा को पूरा करने ही वाला है। लगा, इंतजार में ठिठका हुआ है, हमारे दीदार करने। बहुत नजदीक, इतना नजदीक कि हाथ बड़ा कर छू लें। पूर्णमासी के तुरंत बाद का चांद वैसे भी ज्यादा खूबसूरत होता है। चांद की रोशनी में पहाड़ की भोर को देखने का आनंद अदभुत है। हम ही नहीं पहाड़, पेड, पशु और पक्षी सभी नींद से जाग रहे हैं।

पहाड़ में रात जल्दी होती है। पहाड़ की धार – खाल में ऊंचा – नीचा चलकर दिन जल्दी थक जो जाता है। और, रात को दिन को दबोचने में आसानी हो जाती होगी। पर, पहाड़ की सुबह बड़े नखरे वाली होती है। अलसाई सी, फिर से सोने वाली। जिद्दी इतनी कि उसके पास फिर से सोने के लिए कई बहाने हैं- ठंड है, अभी धूप नहीं आयी, अभी वो सामने का पहाड़ भी तो नहीं उठा, रात बादलों की गड़गड़ाहट ने सोने नहीं दिया, क्या करना है उठ कर, और भी बहुतेरे बहाने पहाड़ी सुबह के मौलिक स्वभाव में हैं।

और, इस समय मेरे यात्रा साथी पहाड़ी सुबह के इसी मायाजाल की गिरफ्त से उभरने की कशमकश में हैं। मेरे पास उनको नींद से जगाने के लिए बचपन में अपने दादाजी से रोज भोर में सुनी ये लोरी गीत सुनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है-
‘‘उठ जाग मुसाफिर भोर भये,
अब रैन कहां जो सोवत है,
जो सोवत है, वो खोवत है,
जो जागत है, वो पावत है।’’

मैंने पूरी कोशिश की, कि अच्छे सुर में गांऊ। परन्तु साथियों की बैचेनी भरी मुस्कराहट बता रही है कि सुबह – सुबह मुझे सुनने से अच्छा टाॅइलट में कुछ देर बंद रहना ज्यादा मुफीद है। ’’चलो, कोई बात नहीं, उनको उठाने का मेरा मकसद तो पूरा हुआ’’ मैं अपने हुनर को मुस्करा कर धन्यवाद देता हूं।

गुप्तकाशी की पोल लाईटें अभी भी जगमगा रही हैं। मुझे आमने – सामने के पहाड़ पर बसे गुप्तकाशी और ऊखीमठ हमेशा एक दूसरे के प्रतिबिम्ब लगते हैं। दूर से आती ओंकारेश्वर मंदिर की घंटियां की टुनटुनाती आवाज मनमोहक है। ऊखीमठ बाजार की ओर बायें मोड़ वाली सड़क मध्यमहेश्वर और तुंगनाथ जाना है तो सीधे जाओ। यह बात सड़क के ऊपर गेट बने हरे बोर्ड पर लिखी सूचना ने हमको समझा दी है।

सुबह की सिरहन और कोहरा अभी भी आस – पास है। सड़क के दोनों ओर जगह – जगह पर कसरत करते और दौड़ते युवाओं से सुबह ज्यादा खुशनुमा हो गई हैं। इनमें से ज्यादतर लड़के – लड़कियां सेना, अर्द्धसैनिक बल अथवा पुलिस में भर्ती होने की तैयारी कर रहे हैं। बच्चे, बुजुर्ग और महिलायें भी अच्छी तादाद में सुबह की सैर पर हैं। धुघंली दिखती संकरी सड़क पर आते – जाते लोग, लिहाजा, गाड़ी की स्पीड का धीमा होना लाजिमी है।

एक आम पहाड़ के युवा ( विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र ) का पहला सपना सेना में भर्ती होना है। गढ़वाल के हर परिवार में सैनिक का होना सामान्य बात है। पर अब सेना में भर्ती होना पहले जैसा आसान नहीं है। दूसरी ओर पहाड़ में रोजगार के विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। इसीलिए, शारीरिक रूप में अपने को सेना के लिए फिट करने की तैयारी हर पहाड़ी युवा करता है। अच्छी बात यह भी है कि पहाड़ी बालिकायें भी इनमें शामिल हैं।

‘‘वाह! क्या खूबसूरत दुनिया है ये, नदी पार घनघोर जंगल, उसके ऊपर बर्फ, नीचे नदी, सामने झरना। हमें कल यहीं पर रुकना चाहिए था’’ नीतू ने कहा।

‘‘तुमको पहाड़ में चलते – चलते हर नई जगह यही लगेगा कि यहां रुकते तो ज्यादा अच्छा था।’’ आशीष ने जबाब में कहा है।

‘‘और, तो छोड़ो, यहां के गबरू कुत्ते खूब मोटे-ताजे हैं। दिखते भयानक हैं पर उतने ही शांत। बस, हर किसी को टुकर – टुकर देखते हैं। और, अनावश्यक भौंकते नहीं’’ हिमाली का कहना है।

‘‘असल में यहां कोई भी जानवर आपको लावारिस घूमता नहीं नजर आयेगा, क्योंकि सबकी अपनी उपयोगिता है, इसलिए उनके लिए खाने – पीने और रहने की कोई कमी नहीं है। उनकी भूख शांत है, इसलिए वे चिड़चिडे़ नहीं सरल स्वभाव के हैं’ मैंने सोचा, जब सब ने बोला तो मैं अपनी बात कहने में पीछे क्यों रहूं? ’’

‘‘आपने सही बोला, कहीं हममें भी न आ जाए चिड़चिड़ापन, बेहतर है चाय के साथ कुछ खा लिया जाय। उठ तो तड़के गए पर पेट को नाश्ते का अभी तक तड़का नहीं लगा’’ हिमाली ने सबके मन बात बोली।

‘‘वाह! दो – दो झरने, वो भी एकदम सड़क पर आकर गिर रहे हैं’’ हिमाली के लिए ये विश्वास से परे है।

‘‘झरने सड़क पर नहीं वरन सड़क झरनों के प्राकृतिक रास्तों में जबरदस्ती आई है’’ मैं कहता हूं। पर इस बात के मर्म को सुनने और समझने की फुरसत किसे है? तीनों साथी झरने की तरफ भाग गए हैं।

चाय – पानी की इस दुकान में धीर – गम्भीर मूड़ में दुकानदारजी अपनी आज की शुरुआती तैयारी में हैं। मैं आस – पास नजर दौड़ाता हूं। कुल मिला कर चार-पांच दुकान और होटल हैं। सुबह की धूप इस धार में आ गई है, पर कोई हलचल नहीं। मैं कई बार आया हूं, इस ओर। खूब चहल-पहल रहती थी, ऊखीमठ से तुंगनाथ की ओर। कोरोना ने आम आदमी के व्यवसाय ही नहीं उसके व्यक्तित्व को भी शिथिल कर दिया है।

‘‘साब, इस कोरोना ने तो सबकी कमर ही तोड़ दी है। कल से कुछ लोग दिख रहे हैं, उससे पहले तो सुन्न पट्ट सन्नाटा ही था। हम दुकानदार एक दूसरे का मुंह देखकर ही सारे दिन का टैम पास करते थे। क्या करें साब? पराठें सादे बनाऊं या तेल के’’ दुकानदारजी और भी कहना चाह रहे हैं, पर ख्याल आया ग्राहक से धन्धे की बात तो कर लूं पहले।

‘‘चाय में चीनी कम ही डालना भाईसहाब’’ मैं कहता हूं।

‘‘अब तो ये आम रिवाज हो गया ‘चीनी कम’। बच्चों को भी नहीं पंसद मीठा, मैगी – सैगी जो खाना सीख गए हैं। सच, बताऊं भै साब कोरोना से बाद के आप पैले टूरिस्ट वाले ग्राहक हैं मेरे।’’ दुकानदारजी बात करने के मूड में हैं।

‘‘पर पिछले दो दिन से इधर खूब आ – जा रहे हैं टूरिस्ट’’ मैं चौंक कर कहता हूं।

‘‘अरे साब, ये ‘आ’ बाद में रहे हैं ‘जा’ पहले रहे हैं। इनका सब कुछ फिक्स है। वो क्या बोलते हैं ‘ओन लैन’। मतलब, हवा में आये हवा में चले गए। हम तो दुकान पर उनकी फटफटिया की फटफटाहट ही सुनने के लिए बैठे हैं। ये तो कई दिनों की घर की कैद से छूटे कैदी जैसा इधर – उधर बस भाग ही रहे हैं। हां, दो-चार रोज बाद पहाड़ में घूमने नहीं कुछ दिन रहने वाले टूरिस्टों की आने की उम्मीद है।’’ दुकानदारजी आशावान हैं।

‘‘पर अब तो कुछ ही दिन बचें हैं सीजन के?’’ मैंने कह तो दिया, पर लगा, उनकी आशा को कमजोर करने वाली बात मुझे नहीं कहनी चाहिए थी।

‘‘हां साब, देखें तब, इस साल क्या होता है? वैसे, हमारे लिए जाड़ों का सीजन ज्यादा फैदे का होता है। तब टूरिस्ट जल्दीबाजी में नहीं रहता है और उसकी खाने-पीने और रहने की मांग ज्यादा होती है। दुकानदारजी यह कहते हुए बार – बार चाय को ऊंची धार देकर उसके उबाल को कम भी कर रहे हैं।

इस साल विगत महीने दो महीने से पानी नहीं बरसा है। इस रास्ते में कई पानी के धारे दिखते थे, इस समय गायब हैं। गधेरे भी शोर के बजाय शांत भाव से बह रहे हैं। चौखम्बा, त्रिशूल, नंदादेवी जैसे शिखरों में बची – खुची बर्फ ही दिखाई दे रही है। इस ओर, इतना सूखापन पहली बार बार देख रहा हूं।

बांज – बुरांस के घनघोर जंगल से लगातार चढ़ती हुई सड़क पर अचानक आये मोड़ से विचारों की तंद्रा टूट गई है। सीधे आगे वाली सड़क गोपेश्वर की ओर है। सड़क के इस तीखे मोड़ के बाद दुग्गल बिट्टा ( समुद्रतल से 2600 मीटर की ऊंचाई ) आने को है।

अंग्रेजों ने पहाड़ों के घने जंगलों की व्यावसायिक उपयोगिता को समझते हुए उनके प्रंबधन की कारगर कार्य नीति बनाई थी। इसी के तहत दुर्गम से भी दुर्गम लेकिन खूबसूरत पहाड़ी स्थानों में अपने भ्रमण के दौरान रहने के लिए रेस्ट हाउस बनाये। दुग्गल बिट्टा बुग्याल में अंग्रेजों का सन् 1925 का बनाया खूबसूरत रेस्ट हाउस आज भी तरोताजा है।

मुझे याद आ रहा है कि कभी किसी मित्र ने बताया था कि सन् 1975 में इमरजेंसी के समय चर्चित राजनेता चौधरी चरण सिंहजी को दुग्गल बिट्टा के इसी रेस्ट हाउस में नजरबंद किया गया था। चौधरी चरण सिंहजी को यह जगह बहुत पंसद आई। उन्होने इच्छा जाहिर की कि उन्हें उनकी नजरबंदी की पूरी अवधि में यहीं रहने दिया जाय। और ऐसा ही हुआ था। चौधरी चरणसिंह बिना अपनी पहचान बताये स्थानीय ग्रामीणों से बात करते थे। इस अवधि में उन्होने स्थानीय लोगों से पहाड़ी खेती के तौर – तरीकों को जाना और अपना खेती – किसानी का ज्ञान उनको दिया।

दुग्गल बिट्टा से चोपता की धार दिखने लगी है। चोपता तक के जगंल में जहां कहीं भी घास के ढ़लवा मैदान हैं, वहां रंग – बिरंगे टैंटों की बारात सी दिख रही है। पीछे छोड़ आये रास्ते में गिनी – चुनी गाड़ियां ही हमारे आगे – पीछे दिख रही थी। अब तो सडक में जहां कहीं भी चौड़ी जगह है वहां कार – टैक्सी ही घुसी हुई हैं। हम तो सोच रहे थे हम ही फन्ने खां हैं, पर यहां तो पहले से ही जगह – जगह गुलजार हैं घुमक्कड़ों से।…….
यात्रा जारी है……
डाॅ. अरुण कुकसाल
यात्रा के साथी-
आशीष घिल्डियाल, नीतू घिल्डियाल, हिमाली कुकसाल

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