3 अक्टूबर, 2020
अक्सर आप धारीदेवी से आगे बढ़ते हैं तो कलियासौड़ लैंडस्लाइड पर बात शुरू हो जाती है। बचपन से हर एक ने इस जगह को ऐसा ही यह धंसते हुए देखा है। लेकिन अब इससे पहले ही अलकनंदा पर पुल बना कर नदी पार सड़क बनाने का काम जोरों पर है, जिससे आने वाले समय में कलियासौड़ भूस्खलन से नहीं गुजरना होगा। परन्तु कलियासौड़ भूस्खलन के किस्से लोगों की जुबान पर तो रहेगें ही।

कलियासौड़ के आगे सड़क के बायें पुलिस की चैक पोस्ट और दायें शराब की दुकान है। रुद्रप्रयाग की ओर जाने वालों के नाम – पते दर्ज हो रहे हैं। लाकडाउन में मिली छूट से छोटी गाडियां और बाइकों की भीड़ सड़कों पर अचानक दिखने लगी है। ऐसे ही जैसे शैम्पेन की बंद बोतल का ढ़क्कन एक झटके में खोलने से आया अनियंत्रित झाग बाहर बिखर जाता है। पुलिस चैक पोस्ट पर लम्बी लाइन है तो शराब की दुकान पर भी अच्छी – खासी भीड़ है। दोनों जगह गहमा – गहमी है, फर्क यह है चैक पोस्ट पर तटस्थता है, तो शराब की दुकान पर बेसब्री। कोरोना से उपजा लाॅकडाउन आम आदमी के लिए आपदा है, तो शराब कारोबारी और सरकार के लिए अवसर।

गुलाबराय आने को है और हिमाली सड़क किनारे स्थित आम के पेड़ के नीचे की एक छोटी सी घेरबाड़ नीतू को दिखाना चाहती है जहां पर जिम कार्बेट ने आदमखोर बाघ को मारा था।

‘‘अब तो गुलाबराय जाने को है और वो जगह क्यों दिखाई नहीं दे रही है?’’ हिमाली मेरी तरफ मुखातिब है।

‘‘लगता है सड़क के चौड़ीकरण से वह घेरबाड़ टूट गई है। वैसे भी समय के साथ वही चीज और स्मृति रह पाती हैं जो वर्तमान संदर्भ में भी प्रासंगिक और उपयोगी हो। जिम कार्बेट और आदमखोर बाघ का मारा जाना आज गुलाबराय के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। इसलिए उस जगह की उपस्थिति स्वतः ही वीरान हो गई हैं’’ मैं कहता हूं।

मैं बताता हूं कि ‘‘उस आदमखोर बाघ ने सन् 1918-26 (आठ साल) के दौरान रुद्रप्रयाग क्षेत्र के 125 से अधिक लोगों मारा था। और, आखिरकार 1 मई 1926 की रात को जिम काॅर्बेट की बंदूक से निकली गोली ने उस बाघ का अंत किया था। तब गांव-गांव से सैकड़ों की तादाद में आये लोगों ने रुद्रप्रयाग आकर जिम कार्बेट की जय-जयकार की थी। जिम कार्बेट शिकारी के साथ एक अच्छे लेखक भी थे। उन्होने इस घटना के संस्मरणों पर ‘रुद्रप्रयाग का आदमखोर बाघ’ पुस्तक लिखी। बीसवीं शताब्दी के उत्तराखंड के जनजीवन के बारे में जिस संजीदगी से उन्होने लिखा है, ऐसा बहुत कम देखने – पढ़ने को मिलता है। उनकी लिखी ‘माइ इंडिया’ बेहतरीन किताब है। तुम सबको यह किताब पढ़नी चाहिए। पर तुम लोग पढ़ते कहां हो, केवल देखते हो और वो भी मोबाइल।’’ गाड़ी में बैठे अन्य तीनों यात्रीगण अब मुस्कराहट के साथ इधर-उधर देख रहे हैं।

मुझे वह किस्सा भी याद आ रहा है कि जब सन् 1942 में मेरठ के मिलैट्री अस्पताल में जिम कार्बेट के सामने द्वितीय विश्व युद्ध में बुरी तरह घायल रुद्रप्रयाग क्षेत्र के किसी गांव का सैनिक उस वक्त अति खुशी से जोर-जोर से रो पड़ा जब उसे मालूम चला कि कारबेट साब (जेम्स एडवर्ड काॅर्बेट याने जिम काॅर्बेट का आमजन में यही नाम था) से सचमुच वह मिल रहा है। बचपन में आदमखोर बाघ के मारे जाने की जो अपार प्रसन्नता अपने मां-पिता और गांव के लोगों में देखी थी, वह उसे हू-ब-हू याद थी। उस सैनिक को इस बात की खुशी हो रही थी कि वह अपने गांव जाकर गर्व से बतायेगा कि उसने कारबेट साब को देखा, उसे छुआ और उससे बात की। जिम कार्बेट की लोकप्रियता का आलम यह था कि वर्षों तक गुलाबराय में 1 मई को आदमखोर बाघ के मरने की याद में मेला मनाया जाता था। जिसमें दूर-दूर के ग्रामीण शामिल होते थे। आज गुलाबराय में भवनों-दुकानों की भरमार है परन्तु वो धरोहर गायब है जिसमें जिम कार्बेट के साहस की खुशबू दशकों तक जीवंत थी।

रुद्रप्रयाग से गुजरते हुए बीच बाजार में पुरखों की छत्र-छाया की तरह विशाल पीपल का पेड़ बचपन की याद दिला देता है। उसकी जड़ों में सिमटे मंदिर को प्रणाम करना चाहा तो वह गायब है। याद आया चौड़ीकरण में उसका विलीनीकरण हो गया है। बाजार के दोनों ओर की कई दुकानें खुरची हुई दीवार में तब्दील हो गई हैं।

‘‘इस जिले का मुख्यालय अगस्तमुनि में बनना चाहिए था। इससे दूर-दराज के इलाकों को भी जिले का फायदा होता और रुद्रप्रयाग पर लोगों और भवनों का दबाव भी कम रहता’’ बाजार की किच-पिच को देखते हुए आशीष कहता है।

‘‘सरकार में निर्णय नीति-निर्धारकों से अधिक राजनैतिक फायदे के अनुसार होते हैं’’ मैं उसे बताता हूं। मुझे सन् 1996 में रुद्रप्रयाग जिले के मुख्यालय की आपसी खींच-तान याद आ गई है।

हमारे आगे की अधिकांश गाड़ियां बदरीनाथ की ओर दौड़ चली हैं। केदारघाटी की ओर चन्द गाड़ियां ही मुड़ी हैं। पुल पार अलकनंदा नदी पर बने पुल को पार करते मिनट भर में आने वाली सुरंग का मन को बचपन से बेसब्री से इंतजार रहता है। 60 मीटर की यह सुरंग अब टूटी-फूटी हालत में है।

अचानक आयी इस यात्रा की तेजी में टैक्सी, निजी गाडी और बाइक ही सड़क पर दौड़ रहे हैं। बिना किसी रोकटोक के गाड़ियों में आगे निकलने की होड़ है। मंदाकिनी नदी के इस ओर तिलवाड़ा, अगस्तमुनि, विजयनगर, चन्द्रापुरी के आस-पास लोग सड़क पर सांयकालीन पैदल घूमने निकले हैं। स्कूटी सीखती महिलायें हर मोड़ पर दिखाई दे रही हैं। मास्क लगाये लोग यदा-कदा ही दिख रहे हैं। लगता नहीं है कि आजकल हम कोरोना काल के विकट समय में हैं।

मंदाकिनी नदी के पार एक के बाद एक पहाड़ी धार और तलहटी पर गांव बसे हैं। गांव के नीचे वाली जमीनों में खेती आबाद है। इस समय की फसल कटने के बाद अगली फसल की तैयारी में ग्रामीण जुटे हैं। महिलायें खेतों में आज दिन भर की फसलपात को संभाल रही हैं। खरपतवार के कई ढे़रों से गहरे धुयें की लकीरें खेतों से आसमान की ओर जाने को है। एकाएक उनसे भक्क से आग की लपटें उठने लगती हैं। इस समय उस पार खेतों में आग-धुंआ, इस ओर सड़क से उठती धूल और बीच में चुपचाप बहती मंदाकिनी मेरे मन-मस्तिष्क में हैं।

सडक चौड़ीकरण के काम में पुरुषों के साथ महिलायें भी लगी हैं। मजदूरों के आस-पास उनके बच्चे भी हैं। धूल का गुबार उनके चारों है। एक पुरानी घोती से बने झूले पर बच्चा है। कुछ बड़े बच्चे मिट्टी-पत्थर से खेलने या फिर काम में जुटे अपनों को एकटक देखने की मुद्रा में हैं। मैं हर बार सोचता हूं कि निर्माण के इन भारी-भरकम बजट वाली परियोजनाओं में लगे मजदूरों के बच्चों की देखभाल और स्कूल की व्यवस्था का प्रावधान तो जरूर होता होगा। मुश्किल से दो किमी के दायरे में ये मजदूर रहते हैं। लेकिन कभी और कहीं भी इन बच्चों के लिए कोई व्यवस्था दिखती नहीं है। दूसरे प्रदेशों से आये इन मजदूरों की कोई सामुहिक आवाज नहीं होती है। इस कारण शोषण की यह परम्परा अनवरत जारी है।

मंदाकिनी नदी के बांये छोर से सटे हुए बांसवाड़ा, भीरी, काकड़ागाड़ और उसके बाद कुण्ड है। कुंड पुल से गुप्तकाशी-केदारनाथ की ओर अधिकतर वाहन मुड़ने लगे हैं। हमें सीधी आगे वाली सड़क से ऊखीमठ की ओर जाना है। अब हमारे आस-पास चलने वाले वाहन गिनती के ही हैं। पीछे छोड़ आयी सड़क खराब थी पर अब आगे सड़क की दुर्दशा पर तरस आने लगा है। तीखे चढ़ाई वाली सड़क के मोड़ों पर सामने आने वाली गाड़ी की गच्चाक से ‘बस, बच ही गए समझो’ वाली मुलाकात हर बार होने को होती है। मोड़ों पर हार्न देना कब सीखेगें हमारे लोकल ड्रायवर?

रुद्रप्रयाग से कुंड तक की घाटी से बाहर निकल कर धार में पसरे ऊखीमठ के बिल्कुल पास हम हैं। शाम होने को है। हवा में तेजी और ठंड का आभास होने लगा है। मंदिर के आस-पास ही रुकना है, ये पहले से ही तय है। जीएमवीएन गेस्ट हाउस का तीर लगा बोर्ड सामने दिखा तो वहीं आज रात का बसेरा कर लिया है।

ऊखीमठ समुद्रतल से 1311 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ऊखीमठ से ऋषीकेश 170 किमी., श्रीनगर 65 किमी., रुद्रप्रयाग 41 किमी. और गुप्तकाशी 13 किमी. की सड़क दूरी पर हैं। किवदन्ती है कि वाणासुर की पुत्री ऊषा और कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह इसी स्थल पर हुआ था। ऊषा के नाम के अनुरूप इसका प्राचीन नाम ऊषामठ था। यह भी मान्यता है कि ऊखीमठ में राजा मान्धाता की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव ने उनको औंकारेश्वर के रूप में दर्शन दिये थे। ऊखीमठ में शिवजी ओंकारेश्वर के रूप में विराजमान हैं। शीतकाल में केदारनाथ और मध्यमहेश्वर की यात्रा बंद होने पर उनकी पूजा-अर्चना ऊखीमठ में की जाती है।

ऊखीमठ का ओंकारेश्वर मंदिर चारों ओर से खूबसूरत कलाकृतियों से युक्त दो मंजिले भवनों से घिरा है। मंदिर के पुजारीजी बता रहे हैं कि ऊषा और अनिरुद्ध के विवाह का साक्ष्यी यह हवन कुंड है। राजा मान्धाता, अनिरुद्ध, पार्वती, ऊषा के साथ ही पंच केदार यथा- केदारनाथ, मध्यममहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर की प्रति मूर्तियां भी मंदिर परिसर में विराजमान हैं। मंदिर के निर्माण की शुरुआत आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य के गढवाल आगमन को माना जाता है।

मंदिर परिसर के भवनों में गजब की कलाकारी उकेरी गई है। परन्तु देख-भाल के अभाव वे टूटने के कगार पर है। ऊखीमठ की मुख्य मोटर सडक इस मंदिर के पास से होती तो मध्यमहेश्वर और तुंगनाथ जाने वाले अधिकांश यात्री ऊखीमठ मंदिर को देखने से वंचित नहीं रहते।

जीएमवीएन गेस्ट हाउस के शुरुआती हिस्से में 3 भारी-भरकम भवनों के आधे-अधूरे अवशेष चुपचाप निरीह अवस्था में खड़े हैं। उनके चारों और बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आई हैं। साफ बात है कि कई वर्षो से इनकी सुध नहीं ली गयी है। हम जानने की कोशिश में हैं निर्माणाधीन इन भवनों का राज क्या है।

‘‘अजी बताना क्या है, सरकार की नालायकी के नमूने हैं ये’’ पास खड़े सज्जन स्वयं ही बोलने लगे हैं।

‘‘बात ये साब, कि 2013 की आपदा के बाद विश्व बैंक की करोड़ों रुपये की सहायता से जगह-जगह गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) के गेस्ट हाउस बनने थे। उनमें से 42 बैड का टूरिस्ट हाउस ऊखीमठ में भी बनना था। ठेकेदारों और नेताओं की मिलीभगत से इन भवनों के बनने से पहले ही बजट सफाचट्ट कर दिया गया। और तो और जब गैरसैण में पहला विधान सभा सत्र चलाने का नाटक हुआ तब इस भवन के लिए आने वाली सामाग्री को वहीं ठिकाने लगा दिया गया। तब कहां से बनते? विश्व बैंक ने और पैसे देने से साफ इंकार कर दिया। अब, पिछले 7 साल से बनने से पहले ही भुतहा रूप में हमको रोज डराते हैं, ये सरकारी कंकाल। सुना, देवप्रयाग और भैंरोघाटी में भी जीएमवीएन के ऐसे अधूरे भवन कंकाल हैं। इस राज्य में सरकार भ्रष्ट्राचार नहीं ब्रजपात कर रही है। क्या क्रांग्रेस और क्या बीजेपी?’’ वो सज्जन एक सांस में ये सब कह गये हैं।

‘‘जनता में विरोध तो हुआ होगा इसका’’ मैंने उन्हें बोलने में कुछ आराम देने की मंशा से कहा।

‘‘क्या होता है साब विरोध करके? जनता में जोश और होश होता तो सरकार भ्रष्ट्राचार के नाम पर चूं भी नहीं कर सकती थी। कमी तो हम जनता की है जो अपने से बाहर ही नहीं निकल पाती है।’’ वो सज्जन हाथ जोड़े विदा लेने की मुद्रा में आ गए हैं।….
यात्रा जारी है-
डाॅ. अरुण कुकसाल
यात्रा के साथी-
आशीष घिल्डियाल, नीतू घिल्डियाल, हिमाली कुकसाल

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