कई दिनों से बन रहे यात्रा कार्यक्रम को अमलीय जामा पहनाया गया। मेरे मित्र Ankit Pant ने बताया था कि नैथानी जी तुंगनाथ व देवरिया ताल एक ऐसी जगह है जहाँ आप एक बार जाओगे तो उम्र भर उस जगह को याद करोगे। छुट्टियों की भारी कमी के कारण दोनों ने प्रस्ताव पास किया कि बाइक से जायेंगें। अपनी बाइक तो रास्ते में ही टें कर जाती तो विचार किराये वाली बाइक में जा रुका।
15जून2017 को शाम को पहुंच गया करोल बाग और बाइक लेली। शर्त थी कि 80km./h से स्पीड ज्यादा नहीं होनी चाहिए।बाइक की टूट फूट की जिम्मेदारी हमारी ही होगी। यूँ तो अपनी बाइक हाइवे में 120 तक उड़ाई थी पर ये GPS ने बेड़ा गर्ग किया हुआ था तो 80 तक सन्तोश करना पड़ा। बाइक लेली आप सभी की चहिती AVENGER😜 ।
बाइक लेने के कुछ देर बाद पन्त जी भी पहुँच गए फिर हम दोनों मित्र पन्त जी के घर जा के सो गए। सुबह 3-3:30 बजे उठे। और 4 बजे निकल पड़े यह सोच के की आज कम से कम सारी गांव पहुंच जायेंगे।करीबन 10 बजे आ पहुंचे ऋषिकेश।
मन करा की बाइक पन्त जी को चलाने के लिए दे दूं पर चैन से आवाज आने लगी। व्यासी में नाश्ता पानी करके जैसे ही थोड़ा सा चले चैन ने तो बस ढिंढोरा ही पिट दिया। अब इस जंगल में हमें छोड़ के न आदमी न आदमी की जात । अब जो बाइक मैं पन्त जी चलाने देने वाला था या खुद उड़ाने वाला था दोनों प्लान रदद्। थोड़ी थोड़ी दूरी में दोनों रूक रूक के अपने अपने अंदाज से चैन को टटोल लेते कि श्रीनगर तक भी जा पाएंगे कि नहीं।
मैं ऋषिकेश से ऊपर इससे पहले व इस रास्ते से नहीं गया था। तो यह अद्भुत नजारा दिखाने के लिए पन्त जी ने हमें रूकवा दिया था। प्रकृति का ये कुदरती U-TURN / Hair pin band (पहाड़ों में इसे HPB कहते हैं) मैंने पहली बार देखा था। 20-25 मिनट बिताये कुछ चित्र भी लिए। मन खुश होगया सोचा चलो अब तुंगनाथ न सही यही देख लिया काफी है। गंगा मां में आस्था तो है ही तो सोचा जैसा मैय्या ने सोचा होगा वही होगा। तो पहुंचे करीबन 12:30 बजे देवप्रयाग। वहाँ बाइक में जुगाड़ हुआ अब मन शांत था कि बाइक श्रीनगर तो चली जायेगी वहीं सही करके आगे जाएंगे। 3:00-3:30 बजे हल्की हल्की बारिश के झमाझम स्वागत के साथ पहुंच गए श्रीनगर। अब बाइक ठीक करवाई। पर 2 KM. चलते ही समस्या फिर से मुँह फुला के बैठ गयी। दोबारा बाइक को दिखाया अब की बार पूरी तसल्ली से सही करवाई। बारिश की बूंदें अभी भी लगी हुई थी । जो बताना चाहती थी कि बचवा यहीं ठहर जाओ मुश्किलें राह और भी हैं। थोड़ा बहुत खाना खा के निकल पड़े सायं 5-5:30बजे अपनी मंजिल की ओर। यह सोच के कि आज कम से कम अगस्त्यमुनि तो पहुंच ही जाएँगे।

रास्ता अब धुमिल सा याद आ रहा था बहुत साल पहले 2000 या 2001 में श्रीनगर आया था वो भी ने नैनीताल-रानीखेत-गैरसेंण- आदिबद्री- कर्णप्रयाग-धारी देवी-श्रीनगर होते हुए आये थे तो बचपन मे देखी आदिबद्री व धारी देवी की अमिट छवि के अलावा सब लगभग भूल ही चुका था। देखते देखते धारी देवी मंदिर का गेट आगया । सोचा रूकूं फिर सोचा लौटते समय देख लेंगे। लगभग 7:30- 7:45 पर नर्कोता होते हुये रुद्रप्रयाग बाईपास की और निकल गए । वैसे अलकनन्दा तो काफी समय से हमारे विपरीत यात्रा की शुभकामनाएं देती हुई जा रही थी लेकिन अब बायपास सड़क में भय अत्यधिक था क्योंकि यहाँ नदी वाली ओर रोकने के लिए कुछ नहीं था।

बायपास सड़क खत्म होने को थी कि नीचे को जाते जाते अचानक से बाइक की रोशनी बन्द हो गयी । पहले तो लगा कि कहीं मुझे रतोंधी( night blindness) तो नहीं हो गयी। लगा अब गए अलकनन्दा में गोता करने वो भी बाइक के साथ। तभी अगले पल याद आया कि गाड़ी बन्द हो गयी है शायद, गाड़ी ढ़लान की ओर थी तो 3-4 प्रयास में बाइक ने अपने दांत फाड़ कर रोशनी दे दी।अब हम तिलवाड़ा से आगे निकलते होटल ढूंढने लगे। रोड किनारे मिल गया लाटा बाबा गेस्ट हाउस। किराया मात्र 400/कमरा। मन्दाकिनी अपने पूरे उफान में बहते हुए स्वागत कर रहीं थी । बाइक को नीचे पार्क किया। फिर थोड़ी देर में खाना खाया और कमरे में दिनभर की थकान कम करने की कोशिश करने लगे। ठंडा था लेकिन अत्यधिक थकने के कारण दोनों ही लेटते ही सो गए थे।

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