अब समय विदा लेने का था और उषा रानी हमें लुभाने के भरसक प्रयास में लगी रही। अब हम गंगा मैया को उषा रानी व मन को शांत कर देने वाली वायु बहन के साथ छोड़ आए। तुंगनाथ में भोर ने मुँह धो लिया था। सभी नाश्ते के ऊपर टूटे हुए थे। नीचे की ओर से पड़ने वाली पहली दुकान में पन्त जी ने अपनी गढ़वाली भाषा की छाप कल शाम ही छोड़ दी थी तो उन भैजी ने भी कल शाम ही खाने की फरमाइश पूछ ली थी । तो मैनें भी बोला यदि यहाँ लिंगुड़े ( एक तरह का फर्न ) मिलते हो तो उसकी सब्जी बनाइयेगा। भैजी ने भी पूरे प्रेम भाव से उन्हें इस हरी भरी पहाड़ी से ढूढ़ कर पका डाला। रात का भोजन तो वो मेरा था ही। मेरी प्रार्थना के कारण बची हुई सब्जी किसी को न दी और सुबह भी वो कटोरे भर सब्जी मैं अकेले ही चट कर गया। मां की भी याद आगयी दिल्ली से घर निकलने से पहले ही मेरी पहाड़ी खाने की लिस्ट निकाल उन्हें जदोजहद से ढूंढ के सिर्फ मेरे लिए ही पकाती है शायद यही मां का प्यार है जो बिन बताए भी उन्हें सब कुछ पता होता है। तुंगनाथ से विदा लेकर लुढ़क पड़े नीचे की ओर। चोपता पहुंचे गेट के विपरीत ही एक शॉर्टकट कच्चा मार्ग नीचे को जा रहा था। हम ने भी अपनी ग्यारह नम्बर की बस इसी मार्ग में दौड़ा दी। २-२:५ किमी. चलने के बाद फिर राष्ट्रीय मार्ग के दर्शन हुए थोड़ा सा चलने के बाद एक ओर कच्चा मार्ग नीचे जिसमें कुछ स्थानीय लोग भी जा रहे थे। इस बार मैंने पन्त जी को मना करा लगा ये रास्ता ज्यादा नीचे निकलेगा पर पन्त जी की ज़िद में हम चल दिये उसी रास्ते में। अब हम निकल आये 1किमी. अपनी बाइक से नीचे । गुस्सा पीते हुए दो चार व्यंग कसे तो उधर से भी 140 की रफ्तार से जवाबों के तीर वापस आ गए। हल्की नोक झोंक करते करते बाइक के पास पहुंचे।

ये मोहतरमा तो धतूरा खा के बेहोश सी पड़ी थी अब तो उठने का नाम नहीं। पता लगा कि बैटरी बहन अपनी अंतिम सांस गिन रहीं हैं इन्हें इलेक्ट्रॉन की जरूरत है। अब हम भी इसी पर सवार हो के नीचे की ओर निकल पड़े। कहीं कहीं पर पन्त जी ने धक्का भी लगाया😜😂। उखीमठ में डॉक्टर साहब छुट्टी पर थे तो हमने नीचे को जाना ही मुनासिफ समझा। अगस्त्यमुनि के आस पास मोहतरमा के डॉक्टर मिले १:३० घण्टे बैटरी बहन में जान फूँकी। अब निकल पड़े अपने अनुपयोगी समान के पास लाटा बाबा गेस्ट हाउस( पता नही क्यों आया था ये समान )। समान उठाया और सोच के निकले की दिल्ली चले अब। 2 किमी चलते ही बैटरी बहन की सांस रुक गयी और साथ मे बाइक भी । बिल्कुल रोड किनारे ही मन्दाकिनी जोर जोर से हम पर हँसती हुई जा रही थी मानो बोल रही हो : बोला था ना बचवा यहीं ठहर जाओ मुश्किलें राह में और भी हैं। तकरीबन 50 कदम पर 3 ट्रक खड़े थे तो उन्ही के पास चल दिये अपनी व्यथा सुनाने। हमारे लिए तो गंगा मैया ने वो फरिश्ते ही भेजे होंगें। बाइक ट्रक के साथ खड़ी कर के उन्होंने तार द्वारा बैटरी में जान फूंक दी। बोले अब श्रीनगर तक कुछ नहीं मिलेगा आज रविवार है बाइक बिना बन्द किये सीधे श्रीनगर चले जाओ। बहुत से पड़ाव आये पर हम रोकना चाहते हुए भी रुक न पाए। दोनों ने एजेंसी वाले को जम कर कोषा। धारी देवी भी हमें बुलाते बुलाते थक गयीं। पर इस विवशता को मां समझ गयी होंगी। सायं 6 बजे श्रीनगर पहुंचे बाइक बैटरी वाली दुकान में लगाई। बैटरी का देहांत हो गया। एजेंसी वाले से बात करके दूसरी बैटरी बदल डाली। रात में श्रीनगर ही रुकना पड़ा।

श्रीनगर से सुबह मखमली हवाओ के साथ निकल पड़े। ऋषिकेश- हरिद्वार में गंगा मां को फिर से मिलने का वचन दे के 80km./h की रफ्तार से घुल गए गुमनाम गलियों में जहाँ मित्रों के अलावा न हम किसी को जानते है और न कोई हमें।
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. न भूलने वाला बर्फीला मौसम हमेशा लू की चपेट को मेरे शरीर पर न लगने देगा। गाड़ियों के शोर में भी महादेव की घण्टियों की गूंज सदा मन में रहेगी। नुमाइशी बाजार आज भी चंद्रशिला की चमक के सामने फीका ही रहेगा। बर्फीली हवाए मन को हमेशा शांत रखेगी। वो प्रेमभाव से समर्पित खाने का स्वाद तो ताउम्र बना रहेगा।

और फिर एक दिन कोई फोन आएगा कही दूर पहाड़ो में हवाओ का पीछा करने के लिए आवाज आएगी: नैथानी चलें क्या ?

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सुझाव : १: जाने से पहले थोड़ी सी जानकारी लेलें। मेरी तरह निर्पट न जायें । मेरे साथ ज्ञानी पुरुष थे तो भटके नहीं।

२: परेशानियों से डरे नहीं। प्रेमभाव, शांति व साहस बनाये रखें। प्रेम से सारे काम आसान हो जाएंगे।

३: साफ सफाई का ध्यान रखें स्टील की बोतल का प्रयोग करें, प्लास्टिक का प्रयोग कम करें। गन्दगी फैलाने वाले को टोक दें।
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फिर उठेंगें एक दिन एक और कहानी के साथ तब तक के लिए : जय गंगा मैया

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