कल मन्दिर के पंडित जी ने बोला था चंद्रशिला जाओगे तो साक्षात शिव के रूप की अनुभूति हो जाएगी। ये वाक्य जब भी नींद खुलती तब यही याद आता। प्रातः 3 बजे बर्फीली हवाओं के बीच उठ गए। तैयार होकर ३:३0 बजे बाहर निकले तो बादलों ने अमावस्या को भी मात दी हुई थी । चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा एक सितारा भी नजर नहीं आ रहा था। मन करा ये लेम्प ही उठा के मार देता हूँ इन घने बादलों में शायद इसकी रोशनी ही बादलों को चीर के चंद्रमा के दर्शन करवा दे। पन्त जी भी बाहर निकल आये बर्फीली हवा सरसराते हुए ललकार रही थीं। और चंद्रशिला तक पहुंचने के चुनोती दे रही थीं। पर मैने भी लोहे को मोड़ना सीखा है और अपने अंदर धैर्य कूट कूट के भरा हुआ है। अब हम तैयार हो गए तो सोचा सब को उठा ही दिया जाए ३:४५ – ४:०० तक हमने सन्नाटे को चीरते हुए अपने चंद्रशिला जाने का बिगुल अपने तरीके( सीटी के द्वारा) से वातावरण में गूंजा दिया।थोड़ी ही देर में शाम को बने मित्र भी आगये। Ankit Pant के साथ Sandeep Dobriyal Sudhir Badoni Jagdish Bahuguna सभी मित्र निकलने के लिए तैयार थे। अब शिवजी तथा गंगा मैया का जयकारा लगा के हम निकल पड़े अपने रण में। आज बादलों ने सारा आकाश छुपा रखा था लग रहा था कि पर्दे के उस पार कुछ अलग साजिश चल रही हो। अंधेरे में रास्ता बमुश्किल ही दिख रहा था। तब पन्त जी के अपने आधुनिक हथियार निकले अब अंधेरे का हारना तय था। लेकिन ठंड बहन जी का साथ पाकर वो अब हमें रोकने के कोशिश में थे। जैसे जैसे हम ऊपर बढ़ रहे थे ठंडा बढ़ता चला गया। अब मैने अपनी रफ्तार पकड़ ली सभी नीचे छूट गए थे ऊपर की ओर नजारा अविश्वसनीय था।

मंदिर के ऊपर चन्द्र देव जगमगा रहे थे। यह दृश्य ही चंद्रशिला को यथार्थ करता है। चन्द्र के नीचे पहाड़ रूपी शिला थी। यही चंद्रशिला है। चन्द्र देव ने अपनी उपस्थिति से हमारी जीत का संदेश दूर देश हिमालय तक पहुँचा दिया था। अब थोड़ा सा चढ़ने के बाद लगभग ४:३० बजे मन्दिर में पहुंचा तो पता चला ये मंदिर तो मेरी गंगा माँ का है। नीचे की ओर देखने में पता चला कि कल आये सभी पर्यटक चढाई में चढ़ रहे हैं बिंदु समान पर्यटक धीमी गति से लक्ष्य की ओर अग्रसर थे। सभी मित्रगण पहुँच गए। अब जीत का जशन मनाना शुरू हुआ।

अंधकार पर सूर्य देव के वार के साथ ही बादलों में अंधकार का रक्त का रंग बिखर गया। सारा आसमां लाल रंग की चादर ओढ़ के सूर्यदेव के दर्शनाभिलाषी हो गया। हिमालय भी बादल की रजाई के अंदर आंखों ही आंखों से चुपचाप बाहर देख रहा था। हिमालय तो ऐसा लग रहा था जैसे नकाब पहने लड़की खड़ी हो। सूर्यदेव को बादलों ने अपनी साजिश से फँसा दिया था। यहाँ हम सभी आतुर होकर हिमालय पर सूर्यदेव की छवि को बिखरते देखना चाहते थे। लेकिन अब देर हो चुकी थी सूर्यदेव अपनी संगिनी ऊषा के साथ टहलते टहलते दूर निकल आये थे। कुछ देर में सभी उसी वातावरण के चित्र लेकर वहाँ से लौट गए। पन्त जी को थोड़ी देर और यहीं रोकने को बोला। अब मैं अलग दूर हिमालय को देखकर सोच रहा था कि पण्डित जी के वाक्य का क्या तातपर्य था तभी क्षण भर में शिव की अनुभूति हो गयी।

सृप जैसा घुमावदार रास्ता शिवजी के कंठ व उनके गले में सजे हुए सृप जैसा था, मन्दिर व आस पास की खूबसूरत जगह उनका मुख मण्डल, चंद्रशिला को जाने वाला रास्ता उनकी जटाएं, और ऊपर तो गंगा मैया विराजमान हैं ही। यह तुंगनाथ पूरा का पूरा शिव स्वरूप है। अब अनुभूति का आनन्द आ गया।

कुछ देर बाद हम भी गंगा मैया से विदा लेकर करीबन प्रातः 8 बजे वापस चल दिये। निचे की ओर से पण्डित जी गंगा मैया के मदिर के द्वार खोलने पहुंचने वाले थे। हम चल पड़े अगले पड़ाव के लिए। छोटे जनाब मूस ( पहाड़ी चूहा पूंछ नहीं होती इनकी पता नहीं क्यों )भी मिले अपने घर ( बिल ) के दरवाजे पर खड़े थे। हमें देखते ही अंदर घुस गए और दरवाजे में पीठ दिखा के खड़े हो गए। बिल्कुल दिल्ली मेट्रो के राजीव चौक स्टेशन की याद दिला दी। हम भी मूस के तरीके पर मुस्कुरा के आगे चल दिये।

आज तक काफी एवरेस्ट की कहानियां सुनी थी और पढ़ी भी थी सभी में एक बात सामान्य थी कि ऊपर को चढ़ने में इतनी परेशानी नहीं होती है असली जान की बाजी तो नीचे को उतरने में लगानी पड़ती है तो अब हमें भी अपनी परेशानियों का सामना करना था।

यात्रा जारी है मिलते है तुंगनाथ में……जाइयेगा नहीं साथ में उतरेंगे
.

.

.

.

.

.
सुझाव:

१: कृप्या साफ सफाई का ध्यान रखें जितना सम्भव हो प्लास्टिक का प्रयोग न करें। एक स्टील की बोतल रख लें और उसी को प्रयोग में लायें। यह प्रकृति हमारा घर है इसे स्वच्छ रखने में शर्माएं नहीं। आपको पानी की बोतल न खरीदने में कोई गरीब नहीं कहेगा।

२: ऐसे लोग जो अपने को भोले का भक्त कहते हैं व मदिरापान करने यहाँ आते है। वे यहाँ न आये। क्योंकि ॐ ही शिव है शिव में ही हम हैं और हमारे अंदर भी शिव हैं। घर में ही अपने अंदर के शिव की भक्ति करके सन्तुष्ट रहे।

No photo description available.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *