चोपता आते ही हम लोग उतर गए। एक तरफ रोड से लगी दुकानें तो दूसरी तरफ घास का बड़ा सा पर्वत था। तुंगनाथ के रास्ते के दर्शन नहीं हुए थे । पूछने में पता चला हम दो मोड़ पहले उतर गए हैं। तुंगनाथ को जाने वाले रास्ते की 6-7 सीडियाँ चढ़ते ही सांस फूलना शुरू हो गई थी। कई पर्यटक व स्थानीय लोग नीचे को उतरते हुए मिले। आस्था की शक्ति के साक्षात आगे से दर्शन हो गए। कम से कम 80 वर्ष की दादी मां बिना किसी के सहारे नीचे की ओर हल्के हल्के उतर रही थी। हम दोनों की आँखें चोंधिया गयी। अब हम एक दूसरे को देख कर अंदर ही अंदर मन मे व्यंग कर रहे थे। शर्म करो शर्म दादी आ के चली गयी और हम लोग हांफ रहे हैं। पन्त जी को अब दिल्ली की आदत हो गयी है तो उन्हें चढ़ने में थोड़ा वक्त लगता है। तो मैने बोला : मैं अब आपको सीधे ऊपर मिलूँगा। थोड़ा सा ऊपर पहुंचा तो रास्ता सांप की तरह टेड़ा – मेड़ा सीधे ऊपर की ओर निकल रहा है। सोचा टेड़ा मेड़ा जाने से बढ़िया सीधे शार्टकट मार लेता हूँ। चढ़ गया अकेले ही सारे सामान के साथ । ऊपर से नीचे देखा तो पन्त जी नीचे छोटे से आते हुए दिख रहे थे। मोड़ पर ऊपर दुकान में रुक गया पन्त जी भी आ धमके । दोनों ने बुरांश का जूस गटका ही था कि एक प्रेमी जोड़ा आ टपका। ये क्या पी रहें हैं आप लोग। अब मौका मिला मुझे अपने को सर्वज्ञानी बनाने का। ये बुरांश ( Rhododendron) के फूलों का जूस है स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। उत्तराखंड के पहाड़ो में ही मिलता है। स्वाद भी मस्त होता है। पी लीजिये। ज्ञान दे के फिर निकल पड़े मंजिल की ओर।

पन्त जी फिर से पीछे छूट गए इस बार मैने मन बना लिया कि मंजिल में जा कर ही रुकूँगा उनकी टेंशन इसलिए नहीं थी क्यूंकि सारा सामान मेरे पास था तो अकेले तो आ ही जायेंगे। लेकिन प्रकृति अकेले नहीं रहने देती। अब मेरे साथ बादल की चादर ऊपर की ओर बढ़ रही थी मानो कह रही हो अब सारा शो खत्म ऊपर जाओगे तो मेरे अलावा कुछ न देख पाओगे। थोड़ी देर में हल्की बारिश शुरू हो गई। अब दौड़ में मैं हार गया लगभग 40-50 मिनट में ऊपर पहुंच पाया। बारिश के साथ सारा प्लान भी पानी मे मिल गया। जो टेंट ले के ढोया किसी काम न आया। थोड़ी देर में पन्त जी भी आगये।

मन्दिर में पहुंचे तो शिव के मंदिर में इंद्र का तांडव मच गया। देखते ही देखते इंद्र देवता रौद्र रूप में आगये । मन्दिर प्रागण में हमें मिला के 5-6 लोग थे। पण्डित जी से पता चला 2 दिन पहले बर्फ गिरी थी । किस्मत से भरोसा ही उठ गया था बर्फ भी न मिली देखने को। ऊपर से ये इंद्र देवता पता नहीं क्यों इतने गुस्से में थे। फिर सोचा शिव जी इस बारिश के बीच में बिजली और चमका दें तो मजा आ जाये। मूसलाधार बारिश रुकी अब नजारे स्वर्गिक थे। ये जो शिवजी ने कलाकारी तुंगनाथ में की हुई हैं वो तो सात जन्मों तक नहीं भूल पाऊंगा।

हरी हरी घास गाय क्या इंसान भी ललचा जाए। नीचे की ओर बादल की चादर और ऊपर की ओर सूर्यदेव की घर को भागने की साजिश चल रही थी। हम सूर्यदेव को बादलों की रस्सी से रोकने की विफल कोशिश कर रहे थे। तो सूर्यदेव भी पूरे नखरे दिखा रहे थे। लाइट धीमी करके अपने थक जाने का सबूत दे रहें थे। हमने भी शिवजी को शिकायत कर देने की धमकी दे डाली। तो सूर्यदेव ने थोड़ा वक्त और दे दिया।

सुनहरी रोशनी में हरी घास भी सुनहरी होगयी। दूर हिमालय देश में गहरे नीले समुद्र के ऊपर सुनहरी बर्फ तैर रही थी। मोनाल भाईसाब भी शर्माते हुए चुपचाप भागते हुए घर को जा रहे थे। जैसे देर हो जाएगी तो घर में पत्नी बेलन की मार मारेगी। फोटो भी ढंग से न खींच सके नालायक की।

चित्रखिंचक यन्त्र की हालत खराब कर दी। सारी परेशानियाँ शिवजी को दे के अब मैं अपने इस सुंदर घर में घूमने निकल गया। सूर्यदेव तो मुझे देखके भागने लगे 5 मिनट में ही उन्होंने अपने कपाट बंद कर दिये। शायद अब उन्हें भी ठंडा लगने लगा। हमने भी पण्डित जी से सम्पर्क कर के धर्मशाला में कमरा ले लिया। मात्र 600रुपये में मिल गया। समान रख के फिर बाहर आये शाम ही सही आया हूँ तो शाम ही देख लेता हूँ। देहरादून से आये कुछ भाई भी मिल गए अब पन्त जी की जरूरत आ पड़ी गढ़वाली बोलते हैं वो। मुझे थोड़ी सी ही बोलनी आती है तो मैं पीछे ही रहता हूँ इसमें। थोड़ी देर में सभी मित्र बन गए । सुबह जल्दी उठकर 4 बजे मिलकर चंद्रशिला जाने का प्लान बन गया। हम चलने के लिए समय पर सीटी बजायेगे।और 10 मिनट बाद चल देंगे चाहे कोई आये या न आये। क्योंकि हम सूर्योदय छोड़ना नहीं चाहते थे।

सभी मन्दिर प्रांगण में एकत्रित हो गए पूजा शुरू हुई अब वातावरण भक्तिमय हो गया। घण्टियों की गूंज हिमालय से टकरा के आकाश में गूंज रही थी। लगा इस आरती में देवगण भी शामिल हैं और ऊपर से बैकग्राउंड म्यूजिक दे रहे हैं। यहाँ लाइट की व्यवस्था नहीं है तो धर्मशाला में हमें सोलर लेम्प मिला मेरा पेट अभी नहीं भरा था तो मैं उसे लेकर फिर घूमने के लिए निकल गया। अब चन्द्र देव की सखी ने अपना रूप दिखाना शुरू किया। ठंड बहन जी ने हमला कर दिया अब तो खा पी के सोने को निकलने में ही भलाई थी।

कमरे में जाकर बिस्तर में कूदकर लेटा ही था कि ये क्या। पर कुछ नहीं बोला क्योंकि पन्तजी खड़े थे। आखिर पन्त जी को भी सच्चाई का सामना करना चाहिए। अब वो भी कूद पड़े मैदाने जंग में😂😂। बिस्तर तो बाहर से भी ज्यादा ठंडा था लग रहा था किसी ने इस पर बर्फ का पानी डाल दिया हो। अब तो भैया हिले बिना 1 ही करवट में लेट गए जैसे तैसे एक आद घण्टे में हाथ पैर गर्म हुए। रात्रि 11 बजे तक गपियाये। फिर सो गए ।ठंड में नींद चोर पुलिस खेल रही थी। कभी आती कभी जाती।

रात में आवाज आयी नैथानी जी सोये हो या उठे हो। आवाज दूसरी थी लगा कोई और तो नही आ गया कमरे में।

मैं : पन्त जी आप हो क्या ?
Ankit Pant जी : हाँ भाई जुखाम लग गया सोये में ही। नींद नहीं आ रहीं है यार । ठण्ड लग रही है।
मैं : हाँ यार। मेरा भी यही हाल है। सो जाओ 12:30 बजा है।

पर अब हम दोनों को ही नींद नहीं आ रही थी हर आधे घण्टे में कभी कभी तो 10 मिनट बाद भी समय देख रहे थे और रात आज युगों के बराबर हो गयी थी। जैसे तैसे 3 बजे हम दोनों ही उठ गए। और चंद्रशिला के लिए तैयार होने लगे।

यात्रा जारी है मिलते है कमरे के बाहर

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