वैसे तो हमारा विचार था कि 16JUNE2017 आज ही सारी गांव पहुंच जाते तो अगली सुबह देवरिया ताल से तुंगनाथ के लिए पैदल ऊपर ऊपर ट्रेकिंग करते जो कि लगभग 14-16km. की है । अगली सुबह मन्दाकिनी के शोर में जल्दी प्रातः 5 बजे उठे। नहा धो के अगली मंजिल के लिये तैयार होगये। अपना फालतू का सामान होटल में ही रखवा के 6-6:15 में अपनी आलसी बाइक उठायी। पर ये तो रात में ही बेहोश होगयी थी तो नीचे की ओर ले जाकर बाइक को जगा दिया। अब पन्त जी को बैठाया व समझाया कि बाइक की तबियत सही नहीं है तो सारी यात्रा में इसे मैं ही संभालूंगा। अब निकल पड़े अगस्तमुनि होते हुए ऊखीमठ की ओर । पन्त जी बता रहे थे कि वो इस साइड काफी आये हुए हैं आर्मी की भर्ती में। आर्मी की भर्ती के क्रेज़ में वो अपनी B.sc के फाइनल प्रेक्टिकल नहीं दे पाए और कहीं के न रहे। फिर उन्होंने दिल्ली की ओर रुख कर लिया। इन्ही सुनहरी यादों के बीच में सूर्य देव आँखें मूंदते हुए दोनों बाहों को फैलाकर हिमालय के पीछे खड़े होने का प्रयास करने लगे। सच में यह अद्भुत नजारा देखने लायक था। अब प्रकृति भी अपने मनमोहक रंग दिखा दिखा के हमें ललचाने लगी। अब नजारा हर मोड़ पर बदलने लगा। कही पक्षियों का चहकना कभी पशुओं का बोलना। ठंड हद से ज्यादा थी तो इंसान आलस्य का मारा नदारद था। हल्के हल्के उखीमठ पहुँच गए। वहाँ पर सारी गांव का रास्ता पूछा तो पता चला (पहाड़ी जवाब ) कि बस पहुंच ही गये बस थोड़ा सा चलने के बाद ऊपर को रास्ता घूम रहा है सारी गांव के लिये । खैर हम दोनों को इस जवाब की आदत है तो 4-5 km. के बाद ऊपर वाले रास्ते में निकल पड़े और पहुंच गए सारी गांव। करीबन 7:30-8 बजे सारी गांव की एक दुकान जो देवरिया ताल के गेट के ठीक विपरीत में थी खुल गयी थी। हमने भी रोब में चाय और मैगी का ऑर्डर दिया जैसे एवरेस्ट में फतह करके आये हो और वो इस उपलब्धि के लिए हमें चाय व मैगी से सम्मानित करेगा। फिर पन्त जी ने गढ़वाली में बात करके उस भाई से मित्रता कर ली।
खा पी के हम चल दिये देवरिया ताल के लिए। अब थोड़ी ही दूरी चढ़ने में एक मंदिर पड़ा। आँखे अब इस मंदिर को हर कोने से देखने लगी। नीचे से ऊपर चढ़ते चढ़ते जब तक मंदिर अदृश्य न हो गया तब तक आंखें उसी पर टिकी रहीं। ढेर सारे तस्वीरों को लिया गया। फिर चढ़ने लगे कुछ पर्यटक हमारे आगे पीछे ऊपर को जा रहे थे पर हम तो अपनी धुन में सवार 20-30 मिनट में चढ़ के पहुंच गए पहली मंजिल में- देवरिया ताल
अब तो नजारा ही अलग था एक ताल उसके चारों तरफ घास के मैदान, चारों ओर घना जंगल, सामने की ओर हीरे की तरह चमकता चौखम्बा पर्वत अद्भुत दृश्य। हिमालय तो बहुत देखा था पर कभी इस तरह भी देखने को मिलेगा मेरे अकल्पनीय ही था। पन्त जी ने ज़िन्दगी के 1 पन्ने में देवरिया ताल की तस्वीर कैद करवा दी। अब तो भैया अनगिनत चित्र लिए गए यहाँ चढ़ के, यहां बैठ के, यहां लेट के , कभी दोनों पैर हवा में। स्थानीय लोगो से पता चला कि जन्माष्टमी को यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है जो यहाँ सच्चे मन से आता है उसे नाग देवता दर्शन देते हैं। तो हमने भी जन्माष्टमी में आने की बात करी ।जो पूरी तो नहीं हुई। वहाँ से तुंगनाथ जा तो सकते हैं पर मौसम की लुककि छुप्पी देखते हुए लोगों ने मना कर दिया। फिर Ankit Pant जी ने भी उनकी ओर सहमति दे दी। मेरी देवरियताल से तुंगनाथ जाने वाली सरकार अल्प बहुमत के कारण गिर गयी। वापस सारी गांव की ओर निकल गए। 5-10 मिनट में नीचे भोजन करके लगभग 2-2:30 बजे चोपता की ओर प्रस्थान करने के लिए निकले।
ढलान देखते ही मैने क्लच दबा दिया और मेरी बाइक भी बेहोश हो गयी। फिर 3-4प्रयास में उठी। अब फिर से चोपता से करीबन 6-7 km. पहले बाइक चलते चलते चढ़ाई में जंगल के बीचों बीच बेहोश हो गयी। मैने पन्त जी को उतारा व मेरा इंतजार करने को कहा । 5 -6 प्रयास किये हर बार बाइक स्टार्ट हो जैसे ही चढ़ाई में क्लच दबा के गेयर दबाता वो फिर बन्द हो जाती। थक हार के नीचे की ओर ही चला गया अब बेशर्म कहीं की नीचे को जाते हुए भी नहीं उठ रही थी। 1-1.5 km में एक कैम्प साइटव उसी का रेस्टोरेंट मिला । अपनी व्यथा सुनाई तो बाइक यहीं रहने दें व किसी गाड़ी में लिफ्ट लेके या पैदल सीधी चढाई चलकर ऊपर जाने का सुझाव मिल गया। अब बाइक से टैंट व अन्य सामान निकाला अब लिफ्ट मिलने का इंतेजार करने लगा। पर कोई फायदा नहीं कोई नहीं रुका।
आवाज आयी : भैजी मैं ऊपर की ओर चढाई वाले रास्ते से जा रहा हूं अगर मैं आपका समान लेकर जाता हूँ तो आप इस चढाई में चल लेंगें। ये खड़ी चढाई है।
मैं: जी बिल्कुल मैं आपके साथ जाऊँगा और समान भी खुद ही ले जाऊँगा। मैंने उसे बताया कि मैं भी पहाड़ी ही हूँ।
तो लगभग 10 – 15 मिनट में हम दोनों ऊपर चढ़ गए । पर पन्त जी तो नीचे ही इंतजार में थे। ये शार्टकट 3km. की दूरी को शार्ट ही कर गया। समान दुकान में रखा और नीचे की ओर 1km. भागा। सीटी भी बजाई पर कुछ असर न हुआ पन्त जी रोड किनारे इंतजार कर रहे थे। पसीने से लतपत मुझे देखकर बोले।

पन्त जी : अरे ऊपर सेकहाँ से आ रहे हो।
जवाब में मैंने अपनी पूरी आपबीती सुना डाली।

अब दोनों भाई ऊपर की ओर निराश मन से चलने लगे। तभी 1 आती हुई बाइक को मैने हाथ दिया तो वह रुक गयी । मेने उत्सुकता में उसे बोला हम तो 2 लोग हैं और ऊपर दुकान में हमारा समान भी है।
1 आ जाओ। मेरा दोस्त भी आ रहा है । 1 उसके साथ बैठ जाना। तभी दूसरा बाइक वाला भाई भी आ रुका। अब हम बैठ गए। समान उठाया फिर चोपता के लिए निकल पड़े। बातों बातों में पता चला वो कर्णप्रयाग से आरहें हैं और चमोली (कोई गांव भी बताया था पर मुझे याद न हो पाया) अपने घर जा रहे हैं। वह आर्मी में है और छुट्टी में घर आया है । छोटा भाई कर्णप्रयाग में पढ़ाई करता है तो उनकी बाइक रखा हुआ है। आज सुबह 1 दोस्त के साथ उसकी बाइक से कर्णप्रयाग गए अब दोनों वापस अपनी अपनी बाइक से जा रहें हैं।
बोले: दोस्त जल्दी घर पहुँचना है तो गाड़ी तेज चला रहा हूँ डरना नहीं।
मैं : भैजी पूरी स्पीड में चलाओ टेंशन नहीं है। 5-8 मिनट में पहुंच गए चोपता।

अभी सायं के 4 बजे थे तो ऊपर तो आसानी से जा सकते थे।

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